डेल्ही कैपिटल्स ने तेज़ तर्रार बल्लेबाज़ ऋषभ पंत की तूफ़ानी पारी के दम पर मुंबई इंडियन्स को अपने पहले मुक़ाबले में 37 रन से हराया दिया.
पंत ने सिर्फ 27 गेंदों में नाबाद 78 रन बनाए. उनकी पारी सात चौकों और सात छक्कों से सजी थी. पंत की इस पारी के दम पर दिल्ली ने मुंबई इंडियन्स के सामने जीत के लिए 214 रन का लक्ष्य रखा. जवाब में मुंबई की टीम 19.2 ओवरों में 176 रन पर ऑल आउट हो गई.
मुंबई के लिए अनुभवी बल्लेबाज़ युवराज सिंह ने 53 रन की पारी खेली लेकिन वो टीम को जीत नहीं दिला सके.
इसके पहले मुंबई ने टॉस जीतकर दिल्ली को बल्लेबाज़ी के लिए बुलाया. दिल्ली की शुरुआत अच्छी नहीं रही. पृथ्वी शॉ सिर्फ सात रन बना सके. लेकिन शिखर धवन ने 43 और कॉलिन इनग्राम ने 47 रन बनाकर बड़े स्कोर का आधार रखा.
इसके बाद ऋषभ पंत ने तूफ़ानी पारी खेलते हुए दिल्ली को 20 ओवरों में 6 विकेट पर 213 के स्कोर तक पहुंचा दिया.
214 रन का लक्ष्य लेकर उतरी मुंबई टीम की शुरुआत ख़ास नहीं रही. कप्तान रोहित शर्मा 14 और डिकॉक 27 रन बनाकर आउट हो गए. पोलार्ड ने 21 और क्रुणाल पांड्या ने 32 रन बनाए. लेकिन मुंबई की टीम 176 रन पर ही आउट हो गई.
आईपीएल-12 में रविवार को हुए दो मुक़ाबलों में से पहले मैच में कोलकाता नाइट राइडर्स ने सनराइजर्स हैदराबाद को छह विकेट से मात दी.
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में गेंद से छेड़छाड़ के मामले में प्रतिबंध से मुक्त हुए ऑस्ट्रेलिया के धुरधंर बल्लेबाज़ डेविड वॉर्नर ने शानदार 85 रनों की पारी खेली.
वॉर्नर की धमाकेदार पारी की बदौलत सनराइजर्स हैदराबाद ने कोलकाता के सामने जीत के लिए 182 रनों का लक्ष्य रखा.
लेकिन केकेआर की ओर से खेलते हुए आंद्रे रसेल ने ताबड़तोड़ बल्लेबाज़ी करते अपनी टीम को मात्र 19.4 ओवर में जीत दिला दी.
एक समय ऐसा था जब कोलकाता की टीम लक्ष्य से दूर दिख रही थी. 15.3 ओवर में केकेआर का स्कोर चार विकेट पर 118 रन था.
तब केकेआर को 27 गेंदों में जीत के लिए 64 रन बनाने थे.
रसेल और गिल ने दिखाया जादू
कोलकाता का चौथे विकेट के नितीश राणा के तौर पर गिरा. राणा ने 47 गेंदों पर आठ चौकों और तीन छक्कों की मदद से 68 बनाए और वो राशिद ख़ान का शिकार हो गए.
आंद्रे रसेल ने हैदराबाद के गेंदबाज़ों की जमकर ख़बर लेते हुए केवल 19 गेंदों पर चार चौके और चार छक्के जमाते हुए नाबाद 49 रन बनाए.
दूसरे छोर पर शुभमन गिल ने भी अपने हाथ खोलते हुए 10 गेंदों पर दो छक्कों की मदद से नाबाद 18 रन बनाए.
वॉर्नर ने दिखाए पुराने हाथ
इससे पहले टॉस हारकर पहले बल्लेबाज़ी की दावत पाकर हैदराबाद के डेविड वॉर्नर ने मैदान में उतरते ही अपने पुराने तेवर दिखाकर समां बांध दिया.
उन्होंने केवल 53 गेंदों पर नौ चौके और तीन छक्के जमाकर 85 रनों की पारी खेली.
उन्होंने दिखा दिया कि अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में अपनी वापसी को लेकर उनमें कितना दमख़म है. इस दौरान उन्हें जॉनी बेयरस्टो का बखूबी साथ मिला.
युवा सनसनी बनकर उभरे विजय शंकर ने भी केवल 24 गेंदों पर दो चौके और दो छक्कों की मदद से नाबाद 40 रनों की पारी खेलकर हैदराबाद को निर्धारित 20 ओवर में तीन विकेट पर 181 रन तक पहुंचने में मदद की.
कोलकाता नाइट राइडर्स ने इस मैच में अपने सात गेंदबाज़ों का उपयोग किया.
आंद्रे रसेल ने गेंदबाज़ी में भी अपना योगदान देते हुए 32 रन देकर दो विकेट झटके.
अनुभवी स्पिनर पियूष चावला ने भी 23 रन देकर एक विकेट हासिल किया.
चमत्कारिक गेंदबाज़ सुनील नरेन को विकेट तो नही मिला लेकिन उन्होंने तीन ओवर में 29 रन खर्च किए और हैदराबाद के बल्लेबाज़ों पर लगाम लगाई.
युवा स्पिनर कुलदीप यादव पर भी सबकी नज़रें थीं लेकिन उन्होंने दो ओवर में 18 रन दे डाले.
वैसे मैच का परिणाम जो भी रहा हो लेकिन डेविड वार्नर ने दिखा दिया है कि आने वाले मैचों में उनसे सावधान रहने की ज़रूरत है.
Monday, March 25, 2019
Monday, March 18, 2019
लोकसभा चुनाव 2019- उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सभी 80 सीटों पर उम्मीदवार उतारे: मायावती
जैसे-जैसे चुनाव की तारीख़ें क़रीब आ रही हैं बीजेपी अपने गठबंधन को मुकम्मल करती दिख रही है. दूसरी तरफ़ कांग्रेस इस मामले में पूरी तरह से पिछड़ती दिख रही है.
बिहार में अब तक महागठबंधन में सीटों के बँटवारे पर सहमति नहीं बन पाई है. आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बेटे और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी इस पर नाराज़गी जताई है.
तेजस्वी यादव ने ट्वीट कर कहा है, ''अगर अबकी बार विपक्ष से कोई रणनीतिक चूक हुई तो फिर देश में आम चुनाव होंगे या नहीं, कोई नहीं जानता. अगर अपनी चंद सीटें बढ़ाने और सहयोगियों की घटाने के लिए अहंकार नहीं छोड़ा तो संविधान में आस्था रखने वाले न्यायप्रिय देशवासी माफ़ नहीं करेंगे.''
ज़ाहिर है तेजस्वी का निशाना कांग्रेस पर है. उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस ने घोषणा की है कि वो सात सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी लेकिन बाक़ी की पूरी सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी. कांग्रेस का कहना है कि उसने ये सात सीटें बीएसपी, एसपी और लोकदल के लिए छोड़ी है.
बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अब कांग्रेस पर तीखा निशाना साधा है. मायावती ने कांग्रेस पर हमला करते हुए ट्वीट किया है, ''कांग्रेस यूपी में भी पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह यहाँ की सभी 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करके अकेले चुनाव लड़े. हमारा यहाँ बना गठबंधन अकेले बीजेपी को पराजित करने में पूरी तरह से सक्षम है. कांग्रेस जबर्दस्ती यूपी में गठबंधन के लिए सात सीटें छोड़ने की भ्रान्ति ना फैलाये.''
अपने दूसरे ट्वीट में मायावती ने लिखा है, ''बीएसपी एक बार फिर साफ़ तौर पर स्पष्ट कर देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में कांग्रेस पार्टी से हमारा कोई भी किसी भी प्रकार का तालमेल और गठबंधन बिल्कुल भी नहीं है. हमारे लोग कांग्रेस पार्टी द्वारा आए दिन फैलाये जा रहे किस्म-किस्म के भ्रम में क़तई ना आएं.''
बीएसपी और एसपी गठबंधन ने कांग्रेस के लिए रायबरेली और अमेठी पर उम्मीदवार नहीं उतारने का फ़ैसला किया है. इस बार उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस के नेतृत्व में तमाम विपक्षी पार्टियों का गठबंधन तैयार होगा लेकिन कांग्रेस ऐसा करने में नाकाम रही.
दूसरी तरफ़ बीजेपी ने बिहार में अपनी जीती सीटें जेडीयू को देकर गठबंधन किया है.
सत्ता हर किसी को बदलती है और पर्रिकर भी इससे अछूते नहीं रहे. जब उन्हें गोवा में राजनीतिक गलियारों में सेंध लगाने और अपनी पार्टी की मदद से सरकार गिराने का मौका मिला तो उन्होंने खुद को एक ऐसे महत्वाकांक्षी, लेकिन ईमानदार शख्स के रूप में पेश किया जो राज्य की राजनीति को भ्रष्टाचार और अस्थिरता से मुक्त करने के मिशन में लगा है.
उन्होंने ऐसे वक्त में जब लोगों का राजनीति पर से भरोसा उठता जा रहा था, अपनी व्यक्तिगत हैसियत से आदर्श पेश कर लोगों में भरोसा जगाया. सजग और पढ़े-लिखे मध्य वर्ग ने उन पर दांव लगाया और एक तरह से पर्रिकर उनके नायक बन गए.
पर्रिकर गोवा में बीजेपी के निर्विवाद नेता थे, पार्टी में ऐसा कोई नहीं था, जो उन्हें चुनौती देता. वो बीजेपी के उन चार विधायकों में शामिल थे, जो सबसे पहले बीजेपी के टिकट पर गोवा विधानसभा के लिए चुने गए थे.
मध्यमार्गी छवि
बीजेपी में जितनी कट्टरपंथी आवाज़ें थी उन्हें पर्रिकर ने गोवा की सीमाओं से परे ही रखा. उनकी खुद की छवि धुर दक्षिणपंथी के बजाय मध्यमार्गी राजनेता की रही. पर्रिकर अक्सर कहा करते थे - "ये गोवा बीजेपी है, यहाँ चीज़ें अलग तरह से होती हैं."
फिर भी वे साल 2014 के चुनावी अभियान में बीजेपी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी जैसी शख्सियत का नाम ज़ोर-शोर से उठाने वाले लोगों में प्रमुख थे. गोवा में बीजेपी की नेशनल एक्ज़िक्यूटिव में मनोहर पर्रिकर ने नरेंद्र मोदी के नाम का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि वे प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी के सबसे बेहतर विकल्प हैं.
इसके अगले दिन गोवा मैरियट होटल की लॉबी में जब मेरी उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा, कुछ कहे जाने की ज़रूरत थी और इसके लिए माकूल वक्त यही था.
नरेंद्र मोदी का नाम बढ़ाने वाली बात का हवाला देते हुए पर्रिकर ने ये कहा था.
राजनीति की इंजीनियरिंग के वे ऐसे बाज़ीगर थे जो धुर विरोधियों को भी एक पाले में लाकर खड़ा कर देने का माद्दा रखते थे. मुख्यमंत्री के तौर पर पहले कार्यकाल में उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की थी लेकिन वे इसमें बुरी तरह से नाकाम रहे.
बिहार में अब तक महागठबंधन में सीटों के बँटवारे पर सहमति नहीं बन पाई है. आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बेटे और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी इस पर नाराज़गी जताई है.
तेजस्वी यादव ने ट्वीट कर कहा है, ''अगर अबकी बार विपक्ष से कोई रणनीतिक चूक हुई तो फिर देश में आम चुनाव होंगे या नहीं, कोई नहीं जानता. अगर अपनी चंद सीटें बढ़ाने और सहयोगियों की घटाने के लिए अहंकार नहीं छोड़ा तो संविधान में आस्था रखने वाले न्यायप्रिय देशवासी माफ़ नहीं करेंगे.''
ज़ाहिर है तेजस्वी का निशाना कांग्रेस पर है. उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस ने घोषणा की है कि वो सात सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी लेकिन बाक़ी की पूरी सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी. कांग्रेस का कहना है कि उसने ये सात सीटें बीएसपी, एसपी और लोकदल के लिए छोड़ी है.
बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अब कांग्रेस पर तीखा निशाना साधा है. मायावती ने कांग्रेस पर हमला करते हुए ट्वीट किया है, ''कांग्रेस यूपी में भी पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह यहाँ की सभी 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करके अकेले चुनाव लड़े. हमारा यहाँ बना गठबंधन अकेले बीजेपी को पराजित करने में पूरी तरह से सक्षम है. कांग्रेस जबर्दस्ती यूपी में गठबंधन के लिए सात सीटें छोड़ने की भ्रान्ति ना फैलाये.''
अपने दूसरे ट्वीट में मायावती ने लिखा है, ''बीएसपी एक बार फिर साफ़ तौर पर स्पष्ट कर देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में कांग्रेस पार्टी से हमारा कोई भी किसी भी प्रकार का तालमेल और गठबंधन बिल्कुल भी नहीं है. हमारे लोग कांग्रेस पार्टी द्वारा आए दिन फैलाये जा रहे किस्म-किस्म के भ्रम में क़तई ना आएं.''
बीएसपी और एसपी गठबंधन ने कांग्रेस के लिए रायबरेली और अमेठी पर उम्मीदवार नहीं उतारने का फ़ैसला किया है. इस बार उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस के नेतृत्व में तमाम विपक्षी पार्टियों का गठबंधन तैयार होगा लेकिन कांग्रेस ऐसा करने में नाकाम रही.
दूसरी तरफ़ बीजेपी ने बिहार में अपनी जीती सीटें जेडीयू को देकर गठबंधन किया है.
सत्ता हर किसी को बदलती है और पर्रिकर भी इससे अछूते नहीं रहे. जब उन्हें गोवा में राजनीतिक गलियारों में सेंध लगाने और अपनी पार्टी की मदद से सरकार गिराने का मौका मिला तो उन्होंने खुद को एक ऐसे महत्वाकांक्षी, लेकिन ईमानदार शख्स के रूप में पेश किया जो राज्य की राजनीति को भ्रष्टाचार और अस्थिरता से मुक्त करने के मिशन में लगा है.
उन्होंने ऐसे वक्त में जब लोगों का राजनीति पर से भरोसा उठता जा रहा था, अपनी व्यक्तिगत हैसियत से आदर्श पेश कर लोगों में भरोसा जगाया. सजग और पढ़े-लिखे मध्य वर्ग ने उन पर दांव लगाया और एक तरह से पर्रिकर उनके नायक बन गए.
पर्रिकर गोवा में बीजेपी के निर्विवाद नेता थे, पार्टी में ऐसा कोई नहीं था, जो उन्हें चुनौती देता. वो बीजेपी के उन चार विधायकों में शामिल थे, जो सबसे पहले बीजेपी के टिकट पर गोवा विधानसभा के लिए चुने गए थे.
मध्यमार्गी छवि
बीजेपी में जितनी कट्टरपंथी आवाज़ें थी उन्हें पर्रिकर ने गोवा की सीमाओं से परे ही रखा. उनकी खुद की छवि धुर दक्षिणपंथी के बजाय मध्यमार्गी राजनेता की रही. पर्रिकर अक्सर कहा करते थे - "ये गोवा बीजेपी है, यहाँ चीज़ें अलग तरह से होती हैं."
फिर भी वे साल 2014 के चुनावी अभियान में बीजेपी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी जैसी शख्सियत का नाम ज़ोर-शोर से उठाने वाले लोगों में प्रमुख थे. गोवा में बीजेपी की नेशनल एक्ज़िक्यूटिव में मनोहर पर्रिकर ने नरेंद्र मोदी के नाम का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि वे प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी के सबसे बेहतर विकल्प हैं.
इसके अगले दिन गोवा मैरियट होटल की लॉबी में जब मेरी उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा, कुछ कहे जाने की ज़रूरत थी और इसके लिए माकूल वक्त यही था.
नरेंद्र मोदी का नाम बढ़ाने वाली बात का हवाला देते हुए पर्रिकर ने ये कहा था.
राजनीति की इंजीनियरिंग के वे ऐसे बाज़ीगर थे जो धुर विरोधियों को भी एक पाले में लाकर खड़ा कर देने का माद्दा रखते थे. मुख्यमंत्री के तौर पर पहले कार्यकाल में उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की थी लेकिन वे इसमें बुरी तरह से नाकाम रहे.
Friday, March 15, 2019
उत्तर प्रदेश : प्रियंका-चंद्रशेखर मुलाक़ात से कांग्रेस को क्या हासिल?
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी ने समाजवादी पार्टी,बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच बने गठबंधन से अलग लोकसभा चुनाव लड़ने का एलान ज़रूर कर रखा है लेकिन राजनीतिक हलकों में उम्मीद जताई जा रही थी कि गठबंधन की संभावनाएं ख़त्म नहीं हुई हैं.
लेकिन पिछले तीन-चार दिनों के घटनाक्रम के दौरान जो कुछ भी सामने आया है, उसने गठबंधन की संभावनाओं को न सिर्फ़ ख़त्म किया है बल्कि गठबंधन के दलों और कांग्रेस पार्टी के बीच कटुता भी बढ़ाई है.
बुधवार को सहारनपुर में भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर की गिरफ़्तारी और फिर तबीयत ख़राब होने पर मेरठ के अस्पताल में उनके भर्ती होने की ख़बर अभी ज़ोर पकड़ने ही वाली थी कि गुरुवार को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के अस्पताल पहुंचकर चंद्रशेखर से मिलने के फ़ैसले ने राजनीतिक तापमान को एकाएक बढ़ा दिया.
महागठबंधन से सीधी तो नहीं लेकिन प्रतीकात्मक प्रतिक्रिया ज़रूर आई और वो भी तत्काल. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बीएसपी नेता मायावती के आवास पर पहुंचते हैं और फिर मायावती के साथ अपनी मुस्कराते हुए एक तस्वीर इस कैप्शन के साथ ट्वीट करते हैं- "आज एक मुलाक़ात, महापरिवर्तन के लिए."
बताया जा रहा है कि अखिलेश का यह ट्वीट बीएसपी नेता मायावती के उस कथित ग़ुस्से और नाराज़गी का प्रतिबिंब है जो भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर और प्रियंका गांधी की मुलाक़ात से उपजा था.
ये अलग बात है कि प्रियंका गांधी ने सीधे तौर पर मना कर दिया था कि उनकी इस मुलाक़ात के राजनीतिक मायने न निकाले जाएं.
दरअसल, भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर की पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित समुदाय के बीच पिछले दो साल में जिस तरह से पैठ बढ़ी है, उससे बीएसपी नेता मायावती ख़ासी चिंतित बताई जाती हैं. हालांकि चंद्रशेखर की पार्टी राजनीति में अभी तक आई नहीं है और न ही हाल-फ़िलहाल उसके आने की संभावना है, लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जब तब सामने आती रहती है.
दूसरी ओर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कम से कम चार लोकसभा सीटों पर उनके समर्थन और विरोध की काफ़ी अहमियत समझी जा रही है.
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा इसके पीछे की वजह बताती हैं, "चंद्रशेखर ने दलित समुदाय के बीच जिस तरह से एक सामाजिक क्रांति लाने की कोशिश है, उनके बीच काम किया है, उससे उस समाज के बीच उनकी स्वीकार्यता निश्चित तौर पर बढ़ी है. दलित समुदाय का एक बड़ा हिस्सा हर वक़्त उनके साथ खड़ा रहता है."
वो कहती हैं, "दूसरी ओर, उन्होंने मायावती को बुआ कहकर आत्मीयता जताने की भी कोशिश की लेकिन मायावती ने बहुत ही बेरुख़ी से उसे ख़ारिज कर दिया. जबकि उन्हें साथ लेकर चलने में मायावती का ही फ़ायदा था."
"एक साल से ज़्यादा समय तक वो जेल में बंद थे, मायावती ने कभी उनका हाल तक नहीं लिया. तो इन सब वजहों से दलित समुदाय में वो मायावती की तुलना में लीड ले चुके हैं. कम से कम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो ऐसा है ही."
जेल से छूटने और यूपी में महागठबंधन बनने के बाद चंद्रशेखर ने गठबंधन को समर्थन का एलान किया था लेकिन मायावती ने चंद्रशेखर के इस रुख़ के स्वागत तक की औपचारिकता नहीं निभाई.
अमिता वर्मा कहती हैं, "प्रियंका से मिलने के बाद भी चंद्रशेखर ने कांग्रेस के समर्थन की बात नहीं बल्कि बहुजन के हित में काम करने की बात कही है. संदेश साफ़ है कि वो बहुजन के हित के लिए किसी के भी साथ होंगे."
जानकारों के मुताबिक़, तात्कालिक रूप से भीम आर्मी अकेले ही बीएसपी को चुनौती देने की स्थिति में भले ही न हो या फिर उसका विकल्प बन पाने की स्थिति में न हो लेकिन आने वाले दिनों में वो सक्षम हो जाएगी, इसमें संदेह नहीं है. यही नहीं, पिछले कुछ सालों में जिस तरह से बीएसपी के तमाम नेता पार्टी छोड़कर गए हैं, बीएसपी में मायावती के बाद कोई सेकेंड लाइन लीडरशिप तक नहीं है.
ऐसी स्थिति में जिस तरह से दलितों के बीच भीम आर्मी का तेज़ी से विस्तार हुआ है, वो मायावती के लिए ख़तरे की घंटी है और मायावती इसे भली-भांति समझती हैं.
यही वजह है कि भीम आर्मी और उसके नेता चंद्रशेखर को मायावती शुरू से ही कोई तवज्जो नहीं दे रही हैं. यहां तक कि चंद्रशेखर के ख़ुद पहल करने के बावजूद मायावती की जो प्रतिक्रिया रही है, वो न सिर्फ़ चंद्रशेखर को बल्कि दलित समुदाय के लोगों को भी हैरान करने वाली थी.
अमिता वर्मा कहती हैं कि नेतृत्व संकट तो अब समाजवादी पार्टी में भी आ गया है. मुलायम सिंह यादव के साथ उनके क़रीबी और अनुभवी नेताओं की जो फ़ौज रहती थी, अखिलेश के साथ वैसा नहीं है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश ऐसा इलाक़ा है जहां कई जगहों पर अल्पसंख्यकों की तादाद काफ़ी है. यहां कई लोकसभा सीटों पर उनका निर्णायक प्रभाव रहता है.
चंद्रशेखर सहारनपुर के रहने वाले हैं. उनकी भीम आर्मी का सबसे ज़्यादा प्रभाव वहीं है. सहारनपुर में साल 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मोदी लहर के बावजूद कड़ी टक्कर दी थी. ऐसे में यदि दलितों का साथ वो थोड़ा-बहुत भी पा जाती है तो उसके लिए ये संजीवनी का काम कर सकता है. दिलचस्प बात ये है कि मायावती ने भी अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत सहारनपुर से ही की थी.
दरअसल, प्रियंका गांधी के आने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं में यदि उत्साह है तो विरोधी खेमे में बेचैनी भी है. ये बेचैनी सिर्फ़ बीजेपी में ही नहीं बल्कि सपा-बसपा में भी है. वहीं प्रियंका का ज़ोर सपा-बसपा जैसी बड़ी पार्टियों के साथ गठबंधन में शामिल होने की बजाय छोटी पार्टियों या संगठनों को अपने साथ लाने में है. चंद्रशेखर आज़ाद से मुलाक़ात को भी उसी क्रम में देखा जा रहा है.
लेकिन पिछले तीन-चार दिनों के घटनाक्रम के दौरान जो कुछ भी सामने आया है, उसने गठबंधन की संभावनाओं को न सिर्फ़ ख़त्म किया है बल्कि गठबंधन के दलों और कांग्रेस पार्टी के बीच कटुता भी बढ़ाई है.
बुधवार को सहारनपुर में भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर की गिरफ़्तारी और फिर तबीयत ख़राब होने पर मेरठ के अस्पताल में उनके भर्ती होने की ख़बर अभी ज़ोर पकड़ने ही वाली थी कि गुरुवार को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के अस्पताल पहुंचकर चंद्रशेखर से मिलने के फ़ैसले ने राजनीतिक तापमान को एकाएक बढ़ा दिया.
महागठबंधन से सीधी तो नहीं लेकिन प्रतीकात्मक प्रतिक्रिया ज़रूर आई और वो भी तत्काल. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बीएसपी नेता मायावती के आवास पर पहुंचते हैं और फिर मायावती के साथ अपनी मुस्कराते हुए एक तस्वीर इस कैप्शन के साथ ट्वीट करते हैं- "आज एक मुलाक़ात, महापरिवर्तन के लिए."
बताया जा रहा है कि अखिलेश का यह ट्वीट बीएसपी नेता मायावती के उस कथित ग़ुस्से और नाराज़गी का प्रतिबिंब है जो भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर और प्रियंका गांधी की मुलाक़ात से उपजा था.
ये अलग बात है कि प्रियंका गांधी ने सीधे तौर पर मना कर दिया था कि उनकी इस मुलाक़ात के राजनीतिक मायने न निकाले जाएं.
दरअसल, भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर की पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित समुदाय के बीच पिछले दो साल में जिस तरह से पैठ बढ़ी है, उससे बीएसपी नेता मायावती ख़ासी चिंतित बताई जाती हैं. हालांकि चंद्रशेखर की पार्टी राजनीति में अभी तक आई नहीं है और न ही हाल-फ़िलहाल उसके आने की संभावना है, लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जब तब सामने आती रहती है.
दूसरी ओर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कम से कम चार लोकसभा सीटों पर उनके समर्थन और विरोध की काफ़ी अहमियत समझी जा रही है.
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा इसके पीछे की वजह बताती हैं, "चंद्रशेखर ने दलित समुदाय के बीच जिस तरह से एक सामाजिक क्रांति लाने की कोशिश है, उनके बीच काम किया है, उससे उस समाज के बीच उनकी स्वीकार्यता निश्चित तौर पर बढ़ी है. दलित समुदाय का एक बड़ा हिस्सा हर वक़्त उनके साथ खड़ा रहता है."
वो कहती हैं, "दूसरी ओर, उन्होंने मायावती को बुआ कहकर आत्मीयता जताने की भी कोशिश की लेकिन मायावती ने बहुत ही बेरुख़ी से उसे ख़ारिज कर दिया. जबकि उन्हें साथ लेकर चलने में मायावती का ही फ़ायदा था."
"एक साल से ज़्यादा समय तक वो जेल में बंद थे, मायावती ने कभी उनका हाल तक नहीं लिया. तो इन सब वजहों से दलित समुदाय में वो मायावती की तुलना में लीड ले चुके हैं. कम से कम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो ऐसा है ही."
जेल से छूटने और यूपी में महागठबंधन बनने के बाद चंद्रशेखर ने गठबंधन को समर्थन का एलान किया था लेकिन मायावती ने चंद्रशेखर के इस रुख़ के स्वागत तक की औपचारिकता नहीं निभाई.
अमिता वर्मा कहती हैं, "प्रियंका से मिलने के बाद भी चंद्रशेखर ने कांग्रेस के समर्थन की बात नहीं बल्कि बहुजन के हित में काम करने की बात कही है. संदेश साफ़ है कि वो बहुजन के हित के लिए किसी के भी साथ होंगे."
जानकारों के मुताबिक़, तात्कालिक रूप से भीम आर्मी अकेले ही बीएसपी को चुनौती देने की स्थिति में भले ही न हो या फिर उसका विकल्प बन पाने की स्थिति में न हो लेकिन आने वाले दिनों में वो सक्षम हो जाएगी, इसमें संदेह नहीं है. यही नहीं, पिछले कुछ सालों में जिस तरह से बीएसपी के तमाम नेता पार्टी छोड़कर गए हैं, बीएसपी में मायावती के बाद कोई सेकेंड लाइन लीडरशिप तक नहीं है.
ऐसी स्थिति में जिस तरह से दलितों के बीच भीम आर्मी का तेज़ी से विस्तार हुआ है, वो मायावती के लिए ख़तरे की घंटी है और मायावती इसे भली-भांति समझती हैं.
यही वजह है कि भीम आर्मी और उसके नेता चंद्रशेखर को मायावती शुरू से ही कोई तवज्जो नहीं दे रही हैं. यहां तक कि चंद्रशेखर के ख़ुद पहल करने के बावजूद मायावती की जो प्रतिक्रिया रही है, वो न सिर्फ़ चंद्रशेखर को बल्कि दलित समुदाय के लोगों को भी हैरान करने वाली थी.
अमिता वर्मा कहती हैं कि नेतृत्व संकट तो अब समाजवादी पार्टी में भी आ गया है. मुलायम सिंह यादव के साथ उनके क़रीबी और अनुभवी नेताओं की जो फ़ौज रहती थी, अखिलेश के साथ वैसा नहीं है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश ऐसा इलाक़ा है जहां कई जगहों पर अल्पसंख्यकों की तादाद काफ़ी है. यहां कई लोकसभा सीटों पर उनका निर्णायक प्रभाव रहता है.
चंद्रशेखर सहारनपुर के रहने वाले हैं. उनकी भीम आर्मी का सबसे ज़्यादा प्रभाव वहीं है. सहारनपुर में साल 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मोदी लहर के बावजूद कड़ी टक्कर दी थी. ऐसे में यदि दलितों का साथ वो थोड़ा-बहुत भी पा जाती है तो उसके लिए ये संजीवनी का काम कर सकता है. दिलचस्प बात ये है कि मायावती ने भी अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत सहारनपुर से ही की थी.
दरअसल, प्रियंका गांधी के आने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं में यदि उत्साह है तो विरोधी खेमे में बेचैनी भी है. ये बेचैनी सिर्फ़ बीजेपी में ही नहीं बल्कि सपा-बसपा में भी है. वहीं प्रियंका का ज़ोर सपा-बसपा जैसी बड़ी पार्टियों के साथ गठबंधन में शामिल होने की बजाय छोटी पार्टियों या संगठनों को अपने साथ लाने में है. चंद्रशेखर आज़ाद से मुलाक़ात को भी उसी क्रम में देखा जा रहा है.
Monday, March 11, 2019
इस्लामिक स्टेट के आख़िरी ठिकाने पर हमला, संघर्ष जारी
सीरिया में इस्लामिक स्टेट समूह के क़ब्जे वाले आख़िरी हिस्से पर हमला बोलने वाले पश्चिम समर्थित लड़ाकों ने बागूज़ गांव में जिहादी समूह द्वारा खाली किए गए कैंप में प्रवेश कर लिया है.
विश्लेषकों का कहना है कि अभी भी काफ़ी संख्या में कट्टर जिहादी लड़ाके इस इलाक़े में हो सकते हैं और इस कारण आख़िरी लड़ाई बेहद गंभीर रह सकती है.
सीरिया में इस्लामिक स्टेट समूह के आख़िरी ठिकानों को घेरकर बैठे पश्चिम समर्थित लड़ाकों ने कहा है कि उन्होंने नया अभियान चलाते हुए हमला बोला है.
सीरिया के बाग़ूज़ गांव को कुर्द और अरब सेनाओं ने घेरा हुआ है. इससे पहले उन्होंने अंदर घिरे इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों के परिजनों को बाहर निकलने का मौक़ा देने के लिए अपने अभियान को रोक दिया था.
सीरियन डेमोक्रैटिक फोर्सेज़ का कहना है कि उन्हें आईसआईएस (इस्लामिक स्टेट) के ख़िलाफ़ लगातार सफलता मिल रही है.
सीरियन डेमोक्रैटिक फोर्सेज़ के एक लड़ाके ने कहा कि वे इस्लामिक स्टेट के कैंप में पहुंच गए हैं.
ज़मान अम्द नाम के इस पश्चिम समर्थित लड़ाके ने कहा, "एक समय यहां पर आईएसआईएस का नियंत्रण था. हम कह सकते हैं कि अभी हम कैंप के शुरुआती हिस्से में हैं और ये काफी बड़ा इलाक़ा है."
"आईएसआईएस अब एक छोटे से इलाक़े में घिर गया है. इसके लड़ाके बाग़ूज़ की पहाड़ी के नीचे मौजूद हैं. बाग़ूज़ गांव के अंदरूनी इलाके पर पहले आईएसआईएस का नियंत्रण था मगर उन्हें दिन-ब-दिन पीछे हटाया जा रहा है.
सीरियन डेमोक्रैटिक फोर्सेज़ (एसडीएफ़) के प्रवक्ता मुस्तफ़ा बाली ने भी अपने लड़ाकों के कामयाब रहने की बात कही है.
मुस्तफ़ा ने कहा, "इस्लामिक स्टेट और उसके लड़ाकों को काफ़ी नुकसान पहुंचा है. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय गठबंधन सेनाओं ने इस्लामिक स्टेट के गोला-बारूद पर बमबारी की और टैकों से भी हमला किया."
एसडीएफ़ के प्रवक्ता ने कहा, "बड़ी संख्या में आतंकवादियों की मौत हुई है और वे ज़ख्मी भी हुए हैं. हम संख्या के बारे में सही से बता नहीं सकते. संघर्ष जारी है. ऑपरेशन तब तक जारी रहेगा जब तक बाग़ूज़ को आतंकवादियों से मुक्त नहीं करा लिया जाता. कुछ भी साफ़ नहीं है मगर हमें लगता है कि 1000-1500 आतंकवादी गांव में हो सकते हैं."
माना जा रहा है कि घेरे गए इलाक़े में अभी भी बड़ी संख्या में इस्लामिक स्टेट समूह के लड़ाके हो सकते हैं जो घेराबंदी करके बैठे पश्चिम समर्थित लड़ाकों को कड़ी टक्कर दे सकते हैं.
आशंका जताई जा रही है कि इस आख़िरी मोर्चे पर भीषण संघर्ष देखने को मिल सकता है.
विश्लेषकों का कहना है कि अभी भी काफ़ी संख्या में कट्टर जिहादी लड़ाके इस इलाक़े में हो सकते हैं और इस कारण आख़िरी लड़ाई बेहद गंभीर रह सकती है.
सीरिया में इस्लामिक स्टेट समूह के आख़िरी ठिकानों को घेरकर बैठे पश्चिम समर्थित लड़ाकों ने कहा है कि उन्होंने नया अभियान चलाते हुए हमला बोला है.
सीरिया के बाग़ूज़ गांव को कुर्द और अरब सेनाओं ने घेरा हुआ है. इससे पहले उन्होंने अंदर घिरे इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों के परिजनों को बाहर निकलने का मौक़ा देने के लिए अपने अभियान को रोक दिया था.
सीरियन डेमोक्रैटिक फोर्सेज़ का कहना है कि उन्हें आईसआईएस (इस्लामिक स्टेट) के ख़िलाफ़ लगातार सफलता मिल रही है.
सीरियन डेमोक्रैटिक फोर्सेज़ के एक लड़ाके ने कहा कि वे इस्लामिक स्टेट के कैंप में पहुंच गए हैं.
ज़मान अम्द नाम के इस पश्चिम समर्थित लड़ाके ने कहा, "एक समय यहां पर आईएसआईएस का नियंत्रण था. हम कह सकते हैं कि अभी हम कैंप के शुरुआती हिस्से में हैं और ये काफी बड़ा इलाक़ा है."
"आईएसआईएस अब एक छोटे से इलाक़े में घिर गया है. इसके लड़ाके बाग़ूज़ की पहाड़ी के नीचे मौजूद हैं. बाग़ूज़ गांव के अंदरूनी इलाके पर पहले आईएसआईएस का नियंत्रण था मगर उन्हें दिन-ब-दिन पीछे हटाया जा रहा है.
सीरियन डेमोक्रैटिक फोर्सेज़ (एसडीएफ़) के प्रवक्ता मुस्तफ़ा बाली ने भी अपने लड़ाकों के कामयाब रहने की बात कही है.
मुस्तफ़ा ने कहा, "इस्लामिक स्टेट और उसके लड़ाकों को काफ़ी नुकसान पहुंचा है. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय गठबंधन सेनाओं ने इस्लामिक स्टेट के गोला-बारूद पर बमबारी की और टैकों से भी हमला किया."
एसडीएफ़ के प्रवक्ता ने कहा, "बड़ी संख्या में आतंकवादियों की मौत हुई है और वे ज़ख्मी भी हुए हैं. हम संख्या के बारे में सही से बता नहीं सकते. संघर्ष जारी है. ऑपरेशन तब तक जारी रहेगा जब तक बाग़ूज़ को आतंकवादियों से मुक्त नहीं करा लिया जाता. कुछ भी साफ़ नहीं है मगर हमें लगता है कि 1000-1500 आतंकवादी गांव में हो सकते हैं."
माना जा रहा है कि घेरे गए इलाक़े में अभी भी बड़ी संख्या में इस्लामिक स्टेट समूह के लड़ाके हो सकते हैं जो घेराबंदी करके बैठे पश्चिम समर्थित लड़ाकों को कड़ी टक्कर दे सकते हैं.
आशंका जताई जा रही है कि इस आख़िरी मोर्चे पर भीषण संघर्ष देखने को मिल सकता है.
Tuesday, March 5, 2019
इमरान ख़ान : ‘मैं शांति का नोबेल सम्मान पाने के क़ाबिल नहीं हूं’
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा है कि वो शांति का नोबेल सम्मान पाने के क़ाबिल नहीं हैं.
दरअसल, अपने क़ब्ज़े से भारतीय वायुसेना के पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान को भारत को सौंपने के बाद पाकिस्तान में इमरान ख़ान को नोबेल का शांति सम्मान दिलाने के लिए अभियान शुरू किया गया है.
अभियान चलाने वालों का कहना है कि इमरान ख़ान ने भारत के साथ युद्ध की आशंका को टाला है जो कि पूरे इलाक़े की शांति के लिए बड़ा क़दम है.
इमरान ख़ान ने पूरे मामले पर ट्वीट कर कहा, ''मैं नोबेल का शांति सम्मान पाने के क़ाबिल नहीं हूं. नोबेल का शांति सम्मान पाने का हक़दार वो है जो कश्मीरियों की इच्छा के अनुसार कश्मीर विवाद का समाधान कर दे और पूरे महाद्वीप में शांति और मानवता के विकास की राह तैयार करे.''
पाकिस्तान में बहुत सारे लोगों ने अपने प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को शांति का नोबेल सम्मान दिलाने के लिए देशभर में ऑनलाइन पीटिशन पर हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है.
इस पर अब तक तीन लाख से ज़्यादा लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं. इनका कहना है कि इमरान ख़ान ने भारतीय पायलट को रिहा कर पड़ोसी भारत से भारी तनाव को कम कर ख़ुद को एक बड़ा नेता साबित किया है.
भारत और पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं. भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा ज़िले में सीआरपीएफ़ के एक क़ाफ़िले पर हमला और 40 से ज़्यादा जवानों के मारे जाने के बाद से दोनों देशों में तनाव बढ़ गया था. भारत सरकार पुलवामा चरमपंथी हमले के लिए पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को ज़िम्मेदार ठहरा रही है.
भारत ने इस हमले के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में चरमपंथी संगठनों के कैंपों पर हमला किया तो पाकिस्तान ने भी भारत के एक लड़ाकू विमान को मार गिराया और पायलट को कस्टडी में ले लिया था.
इमरान ख़ान ने संसद में भारतीय पायलट अभिनंदन वर्तमान की रिहाई की घोषणा कर दी थी और इसके बाद से तनाव कुछ कम हुआ.
गुरुवार को पाकिस्तान में हैश टैग नोबेल प्राइज़ फ़ॉर इमरान ख़ान ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा था. इमरान ख़ान की घोषणा के बाद लोगों ने इस हैशटैग के साथ ट्वीट करना शुरू कर दिया था.
ब्रिटेन और पाकिस्तान में चेंज डॉट ओआरजी पर भी लोगों ने कैंपेन शुरू किया है. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के सूचना मंत्री फ़व्वाद चौधरी ने भी संसद को एक प्रस्ताव भेजा है.
इस प्रस्ताव में इमरान ख़ान के लिए संसद से प्रस्ताव पारित कर नोबेल पुरस्कार की मांग करने की बात कही गई है. फ़व्वाद चौधरी ने इस प्रस्ताव में लिखा है कि इमरान ख़ान ने तनाव को कम करने में अप्रत्याशित भूमिका अदा की है.
पूरे मामले में भारतीय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू ने भी इमरान ख़ान की तारीफ़ की थी. काटजू ने ट्वीट किया था कहा था, ''मैं इससे पहले इमरान ख़ान की आलोचना करता रहा हूं, लेकिन उनकी स्पीच सुनकर मैं प्रशंसक बन गया हूं.''
मार्कण्डेय काटजू के इस ट्वीट को पाकिस्तानी मीडिया में काफ़ी तवज्जो मिली तो दूसरी तरफ़ भारत में इस ट्वीट के लिए उन्हें सोशल मीडिया पर काफ़ी खरी-खोटी सुननी पड़ी.
अपने एक और ट्वीट में काटजू ने लिखा है, ''जब मैंने पाकिस्तान को फ़र्ज़ी और कृत्रिम देश कहा था तो किसी पाकिस्तानी ने मुझे गाली नहीं दी थी. अब मैंने इमरान ख़ान की तारीफ़ की तो दर्जनों भारतीयों ने मुझे गाली दी. मुझे देशद्रोही, सनकी और पाकिस्तान परस्त कहा गया. अब आप ही बताइए कौन ज़्यादा परिपक्व है?''
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ويشرح فواز هذه النقطة بالقول
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