Tuesday, February 5, 2019

प्लास्टिक की ये नई नस्ल बदल सकती है दुनिया

इंसान ने क़रीब एक सदी पहले प्लास्टिक ईजाद किया ताकि क़ुदरत को अपनी ज़रूरतों से हो रही तबाही से बचा सके. लेकिन, आज की तारीख़ में प्लास्टिक ने ही धरती पर तबाही ला दी है.

समंदर, प्लास्टिक के कचरे के ढेर में तब्दील हो रहे हैं. प्लास्टिक की वजह से इंसान मर रहे हैं, दूसरे जीव-जंतुओं की जान जा रही है. लेकिन, प्लास्टिक इतने ज़रूरी बन गए हैं कि आज इनके बिना ज़िंदगी की कल्पना मुमकिन नहीं.

इनके क़ुदरती विकल्पों से इंसान की ज़रूरतें पूरी नहीं की जा सकतीं.

तो, अब इंसान की लाई इस तबाही का हल क्या है?

ज़ाहिर है हमें क़ुदरत से ही इस मुश्किल का रास्ता मिल सकता है. एक रास्ता दिखा रहे हैं तुर्की के तीन युवा.

वो मशहूर सूफ़ी संत रूमी का हवाला देते हैं कि, "जब आप चलना शुरू कर देते हैं, तो रास्ता ख़ुद ब ख़ुद बनने लगता है."

वो बताते हैं कि हमारा साझा ख़्वाब ही हमें इस कारोबारी रास्ते पर ले कर चल पड़ा. तुर्की के ये तीन युवा आज जैतून के बीजों से प्लास्टिक तैयार करने का नुस्खा लेकर आए हैं. इस्तांबुल के रहने वाले ये युवा आज जैतून के बीजों से बायोप्लास्टिक तैयार कर के दुनिया को नई राह दिखा रहे हैं.

ये लोग जैतून के बीज में पाए जाने वाले सेल्यूलोज़ की मदद लेते हैं. इसकी प्रेरणा इस टीम के सदस्य दुग्यू यिलमाज़ के पिता से मिली थी.

साथी उस वक़्त को याद कर के कहते हैं कि एक दिन यिल्माज़ ने बताया कि उनके पिता की एक अजीब आदत थी. वो जैतून के बीज चबा जाया करते थे.

इस अजब आदत पर बातचीत करते हुए तीनों दोस्तों को एक नया आइडिया आया. यिल्माज़ के अलावा इस टीम के दो अन्य सदस्य हैं, मेहमत अमीन ओज़ और अहमत फ़तीह अयास.

वो कहते हैं कि हमारा उत्पाद इसलिए ख़ास है क्योंकि हम इसे जैतून के तेल के कारखानों से निकलने वाले कचरे को रिसाइकिल कर के बनाते हैं. यानी हम धरती और पर्यावरण को संरक्षित करते हुए विकास करने में अपना योगदान देते हैं.

इन तीनों की कंपनी जो बायोप्लास्टिक बनाती है उसका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स और फूड पैकेजिंग उद्योग में होता है.

जैतून के बीजों से तैयार होने वाला एक किलो बायोप्लास्टिक, 6 किलोग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन कम करता है.

अहमत बताते हैं कि उनका परिवार गांव में रहता था. वो अपने भाई के साथ बचपन में ही छोटे-मोटे औज़ार बनाते थे. वहीं मेहमत बताते हैं कि उनका जन्म छोटे से क़स्बे कोन्या में हुआ था. वो मछलियों को पकड़ कर उन्हें बोतल में बंद करके घर लाते थे. और फिर बड़े से एक्वेरियम में छोड़ देते थे.

मेहमत कहते हैं कि जब वो अपने छोटे से क़स्बे से इस्तांबुल आए तो उन्हें लगा कि वो एक बड़े से एक्वेरियम में आ गए हैं.

तीनों दोस्तों ने मिलकर पहले एक छोटी सी प्रयोगशाला खोली थी. यहां उनके कई तजुर्बे फेल हो गए. लेकिन, तीनों दोस्तों ने अपनी कोशिशें जारी रखीं और आख़िर में वो एक नमूना बनाने में कामयाब हो गए.

इस साल वो अपने इस नमूने को अमरीका की सिलिकॉन वैली लेकर गए. उन्हें इस प्रयोग के लिए कई अवार्ड मिले. कई निवेशक उनके उत्पाद को आगे बढ़ाने के लिए पैसे लगाने को तैयार हो गए.

इनकी टीम ने 5 टन जैतून के बीजों से 3.5 टन बायोप्लास्टिक तैयार करके दिखा दिया है कि इरादे मज़बूत हों तो मंज़िल मिल ही जाती है.

प्लास्टिक जिस तेज़ी से हमारी सभ्यता ही नहीं, पूरी धरती के लिए ख़तरा बनता जा रहा है, उससे ऐसा लगता है कि आने वाले वक़्त में समुद्र में ऐसे ही कचरा जमा हुआ, तो जीवन मुश्किल हो जाएगा.

ये बात जानने के बाद अहमत, मेहमत और यिल्माज़ को लगता है कि उनका प्रोजेक्ट केवल उन तीनों के लिए ही नहीं, बल्कि बाक़ी दुनिया के लिए भी अहम है. ये इंसानियत को सलामत बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा क़दम साबित हो सकता है.

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