त्रिशूल फ़िल्म का एक गाना है, 'मोहब्बत बड़े काम की चीज़ है, काम की चीज़ है', जिसमें शशि कपूर अपने शोख और चुलबुले अंदाज़ में माशूका हेमामालिनी के साथ बार बार ये दोहरा रहे हैं कि 'मोहब्बत बड़े काम की चीज़ है.'
ये शशि कपूर के लिए केवल एक फ़िल्म के गाने के बोल भर नहीं थे क्योंकि उनका पूरा जीवन ही प्रेम से सजा संवरा था. शशि कपूर और जेनिफ़र कैंडल की प्रेम कहानी भले आज से यही कोई 52 साल पहले शुरू हुई थी लेकिन इसे आज भी बॉलीवुड की सबसे बेमिसाल लव स्टोरी मानने में शायद ही किसी को कोई मुश्किल होगी.
ये लव स्टोरी शुरू हुई थी, 1956 में और उसके बाद शशि कपूर अपने पूरे जीवन भर इस मोहब्बत से बाहर नहीं निकल पाए थे. वैसे इसकी शुरुआत बेहद दिलचस्प अंदाज़ में हुई थी.
जेनिफ़र की छोटी बहन और ब्रिटिश रंगमंच की जानी मानी अदाकारा फैलिसिटी कैंडल ने अपनी पुस्तक 'व्हाइट कार्गो' में लिखा है, "जेनिफ़र अपने दोस्त वैंडी के साथ नाटक 'दीवार' देखने रॉयल ओपेरा हाउस गई थी. शशि तब 18 साल के थे.नाटक शुरू होने से पहले उन्होंने दर्शकों का अंदाज़ा लगाने के लिए पर्दे से झांका और उनकी नजर चौथी कतार में बैठी एक लड़की पर गई. काली लिबास और सफेद पोल्का डॉट्स पहने वो लड़की ख़ूबसूरत थी और अपनी सहेली के साथ हंस रह थी. शशि के मुताबिक वे उसे देखते ही दिलो-जान से उस पर फिदा हो गए थे."
लेकिन तब पृथ्वी थिएटर में काम करने वाले शशि कपूर की कोई बड़ी पहचान नहीं थी, उनकी उम्र महज 18 साल थी. दूसरी तरफ जेनिफ़र अपने पिता जेफ़्री कैंडल के थिएटर समूह की लीड अभिनेत्री थीं. थिएटर के चलते दोनों के पिता भी आपस में एक दूसरे को पहचानते थे. लेकिन इन सबके बाद भी शशि कपूर को जेनिफ़र से दोस्ती के लिए इंतज़ार करना पड़ा.
शशि कपूर ने अपनी पुस्तक पृथ्वीवालाज में लिखा है, "मैंने जेनिफर के कई नाटक भी देखे, लेकिन उन्होंने कोई नोटिस नहीं लिया. कुछ दिनों के बाद एक दिन रॉयल ओपेरा हाउस में उन्होंने कहा कि मैं बंबई में रहती हूं और हम लोग मिल सकते हैं."
शशि कपूर को गे समझ बैठी थीं जेनिफ़र
इसके बाद शशि कपूर रोजाना ही जेनिफ़र से मिलने लगे. जेनिफ़र तब शशि कूपर से पांच साल बड़ी थीं. इसके लिए वे मुंबई की लोकल से एक स्टेशन ज़्यादा दूर तक जाते थे ताकि जेनिफ़र के साथ फिर वे थिएटर के अभ्यास के लिए रॉयल ऑपेरा हाउस तक साथ साथ जाते थे.
उन्होंने अपने इन मुलाकातों के बारे में लिखा है, "रॉयल ओपेरा हाउस के पास एक ढाबा हुआ करता था, मथुरा डेयरी फर्म. हम लोग तब पूरी भाजी की प्लेट खाते थे. तब एक प्लेट चार आने का मिलता था. साथ ही खाते थे."
वैसे दिलचस्प ये ही तब शशि कपूर बेहद शर्मीले हुआ करते थे, इतने शर्मीले कि जेनिफ़र उन्हें गे समझने लगी थीं. इस बारे में शशि कपूर ने पृथ्वीवालाज़ में लिखा है, "जेनिफ़र ने मुझे बाद में बताया कि वो मुझे गे समझने लगी थी."
हालांकि इसकी वजह भी बेहद दिलचस्प थी. शशि कपूर भारतीय मानसिकताओं के मुताबिक जब जेनिफ़र के साथ होते थे, तब उनका हाथ पकड़ बैठे रहते थे. जेनिफ़र जिस संस्कृति से आई थीं, वहां हाथ में हाथ लेकर बैठने को असहज माना जाता था.
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ويشرح فواز هذه النقطة بالقول
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