Thursday, December 13, 2018

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को मिली जीत, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए प्रस्तावित महागठबंधन में राहुल गांधी को अगली क़तार में लाकर खड़ा कर दिया है.

तेलंगाना में मिली नाकामी ने भले ही आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की धार कम कर दी हो लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए के ख़िलाफ़ राज्यवार गठजोड़ बनाने की शुरुआत कर दी है.

कांग्रेस पार्टी की कमान औपचारिक तौर पर संभाले हुए राहुल गांधी के एक साल पूरे हो गए हैं.

और तब से अब तक कांग्रेस के अंदर और बाहर दोनों ही मोर्चों पर राहुल गांधी का क़द यक़ीनन बढ़ा है.

साल 2014 के बाद पहली बार मोदी-शाह की बीजेपी राहुल की कांग्रेस के हाथों सीधे मुक़ाबले में हारी है.

राहुल गांधी पर अब इस बात का दबाव बढ़ेगा कि वे ख़ुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश करें या क्षेत्रीय पार्टियों का गठजोड़ खड़ा करने की पहल करें.

और तस्वीर का दूसरा पहलू ये भी है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के अपने ख़ेमे में इतनी जगह ही नहीं है कि उसमें मायावती की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को समाहित किया जा सके.

सत्तर सांसदों और 320 विधायकों के साथ किसी भी गठबंधन में मायावती के लिए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वाजिब सीटें छोड़ना एक ख़ौफ़नाक़ अनुभव हो सकता.

इसके नतीजे भी उल्टे साबित हो सकते हैं.

जम्मू और कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और गुजरात, पूरी हिंदी पट्टी से लोकसभा के लिए 273 सांसद चुने जाते हैं.

मौजूदा लोकसभा में इनमें से क़रीब 200 सीटें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं.

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों और उत्तर प्रदेश में बसपा और समाजवादी पार्टी के संभावित गठजोड़ के मद्देनज़र इस बात की पूरी संभावना है कि भाजपा साल 2019 के आम चुनावों में 80 से 100 सीटें तक गंवाने जा रही है.

तेलंगाना में गठबंधन की आस और पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल या फिर तमिलनाडु में सीटें बढ़ने की उम्मीद से इन सीटों की चौथाई से ज़्यादा की भरपाई के आसार नहीं दिखते.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की कामयाबी सबसे ज़्यादा स्पष्ट है. ये वो सूबा है जहां कांग्रेस के पास कोई भी ताक़तवर क्षत्रप नहीं था.

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