भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के नये मुख्यमंत्री होंगे. रविवार को विधायक दल की बैठक के बाद पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनके नाम की घोषणा की.
राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री के तौर पर वो सोमवार (17 दिसंबर) को रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में शपथ लेंगे. शपथग्रहण की तैयारी पूरी कर ली गई है.
इससे पहले मुख्यमंत्री पद के दूसरे दावेदार टीएस सिंहदेव ने बघेल और खुद को 'जय-वीरू की जोड़ी' बताते हुये शोले का गीत 'तेरे जैसा यार कहां' और 'ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे' को दोहराते हुये दावा किया कि वो कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे.
विधानसभा में प्रतिपक्ष के उपनेता रहे आदिवासी विधायक कवासी लखमा ने कहा, "छत्तीसगढ़ के एक किसान के बेटे को मुख्यमंत्री बनाकर हमारी पार्टी ने संदेश दिया है कि राज्य के गरीब, आदिवासी और किसान सुरक्षित हैं. हमारे बस्तर के विकास का रास्ता साफ़ हो गया है."
कैसे तय हुआ नाम
दिल्ली में पिछले तीन दिन से कई दौर की बैठक के बाद रविवार की सुबह ही भूपेश बघेल के अलावा पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे और छत्तीसगढ़ के प्रभारी पीएल पुनिया समेत दूसरे नेता रायपुर पहुंचे थे.
इस घोषणा के साथ ही पिछले कई दिनों से पार्टी के भीतर चला आ रहा गतिरोध खत्म हो गया है.
माना जा रहा है कि रायपुर से लेकर दिल्ली तक पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ कई-कई दौर की बैठकों के बाद शनिवार को ही भूपेश बघेल का नाम तय हो गया था. जिस पर रविवार को विधायक दल की औपचारिक मुहर लगाई गई.
इससे पहले छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे टीएस सिंहदेव को इस पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा था. इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत और सांसद ताम्रध्वज साहू के नाम पर भी चर्चा हुई थी.
तेज़तर्रार नेता की पहचान
अविभाजित मध्य प्रदेश के दुर्ग में 23 अगस्त 1961 को जन्मे भूपेश बघेल का संबंध किसान परिवार से है.
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने वाले भूपेश बघेल ने एक आक्रमक राजनीति करने वाले कांग्रेस के नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई है.
चार साल तक युवक कांग्रेस के ज़िला अध्यक्ष रहने वाले भूपेश बघेल को बाद में मध्य प्रदेश युवक कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया.
पहला चुनाव
1993 में जब विधानसभा चुनाव हुये तब भूपेश बघेल ने पहली बार दुर्ग की पाटन विधानसभा से चुनाव लड़ा और बसपा के केजूराम वर्मा को हरा कर विधानसभा में पहुंचे. 1998 में भाजपा की निरुपमा चंद्राकर को हराने के बाद उन्हें मध्यप्रदेश की दिग्विजय सिंह सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया.
छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनने के बाद 2003 में हुये चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और उन्हें विधानसभा में विपक्षी दल का उपनेता बनाया गया. हालांकि 2004 में दुर्ग से और 2009 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन उन्हें दोनों ही चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. 2008 में वे विधानसभा चुनाव भी हार गये.
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