Monday, February 25, 2019

全球教育的六类排序:香港家庭投入高居首位

对全球大部分国家而言,秋季意味着新学年的开始。不过在美国、智利、俄罗斯和冰岛,不同国家的情况又很不一样。

哪个国家的学生在校时间最短?哪个国家的家庭在学习用品上开销最多?又是哪个国家的学生平均受教育时间竟长达23年?

在美国,有孩子在上幼儿园到中学的家庭平均要花685美元(合537英镑)购买上学的必需品,从2005年至今增加了近250美元(合196英镑)——2018学年的总开支高达275亿美元(合215亿英镑)。

算上有大学生的家庭,2018学年的总开支将攀升至830亿美元(合650亿英镑)。其中开销最大的是电脑,每家平均299美元(合234英镑);其次是服装,平均286美元(合224英镑);接着是平板电脑和计算器等电子产品,平均271美元(合212英镑);最后是一些基本学习用品:活页夹、文件袋、教辅书、荧光笔等,平均112美元(合88英镑)。2018年以及之后在学习用品上的支出还将继续增长。(资料来源: Statista / Deloitte)

在33个发达国家中,俄罗斯小学生每年在学校的时间最短——500多个小时(全球平均800小时)。相当于在为期8个月的学年里,加上课间休息,学生每天在校大约只有5小时。但俄罗斯的文化普及程度却并没有被拉低,反而趋近100%。

而丹麦小学生每年大约需要上1000小时的课,比俄罗斯几乎多出两个月,每天在校时间也更长。但是丹麦教育始终位居世界前五,似乎说明学年时间长也是有好处的。(资料来源: OECD)

根据孩子上学地点的不同,香港家庭在教育上的总支出相差超过10万美元(合7.8万英镑)。算上从小学到大学本科的学费、书本费、交通和住宿费,香港是全球生活成本最高的地方——而且远远高出其他地方。即使算上奖学金、助学贷款和政府资助,香港的父母们在教育上的平均投入也高达13.1万美元。

阿联酋是全球第二贵的,约9.9万美元,排名第三第四的是新加坡和美国,分别为7.1万美元和5.8万美元。尽管美国上大学的成本飙升,但是每个家庭只用承担年均教育总支出的23%。再对比法国,孩子们的教育支出大约只需要1.6万美元。(资料来源: HSBC / Sallie Mae)

即使在如今这个有着虚拟现实、3D打印和无人机技术的时代,铅笔仍然在世界各地的机构中占据一席之位。在发明铅笔400多年后的今天,全球每年大约生产150到200亿支铅笔。

太平洋西北地区的雪松是美国最常见的铅笔木材,石墨大部分在中国和斯里兰卡开采。每年大约需要砍伐6万到8万棵树用来满足全球的铅笔需求。(资料来源: The Economist)

上学总会有个头,但在新西兰和冰岛这些国家,却要二十年。"学生生涯"是根据从小学到大学本科不同年龄的平均入学率计算的。澳大利亚从小学到大学的在校时间是目前全球最长的,长达22.9年,从6岁到28岁一直在上学。排名最后的是尼日尔,孩子们一般7岁开始上小学,学生生涯平均只有5.3年,比澳大利亚少17年。(资料来源: Global Innovation Index)

Tuesday, February 19, 2019

मोदी ने कहा- हमने जनता का पैसा लूटने वालों को सजा दी, ईमानदारों की मदद की

वाराणसी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि उनकी सरकार ने जनता का पैसा लूटने वालों को सजा दी है तो ईमानदारों की मदद भी की है। भ्रष्ट लोगों पर नकेल कसने के लिए नोटबंदी करने के साथ, बेनामी संपत्ति और कालेधन के खिलाफ कानून बनाया। उनका कहना था कि नए भारत में बेईमानी, भ्रष्ट आचरण के लिए जगह नहीं है। सरकार संत रविदास के बताए उस रास्ते को आत्मसात कर रही है, जिसमें सच्चे श्रम को ईश्वर का रूप बताया गया है।

डीजल से इलेक्ट्रिक में बदले गए इंजन को हरी झंडी दिखाई

मंगलवार को अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहुंचे। यह उनका 17वां दौरा है। सबसे पहले उन्होंने डीजल से इलेक्ट्रिक में बदले गए इंजन को हरी झंडी दिखाई। रविदास जयंती के मौके पर मोदी ने सीर गोवर्धनपुर स्थित उनके मंदिर में माथा भी टेका। दोपहर बाद वे संत समागम स्थल पहुंचे। इसके बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में कैंसर हॉस्पिटल का लोकार्पण किया।

वाराणसी में मोदी 2130 करोड़ की परियोजनाओं का लोकार्पण करेंगे। मोदी कुछ परियोजनाओं का शिलान्यास भी करेंगे। इनमें सेंट्रल डिस्‍कवरी सेंटर, स्‍मार्ट सिटी इं‍टीग्रेटेड कमांड सेंटर, मान महल म्‍यूजियम, गोइठहां एसटीपी प्रमुख हैं। फरवरी महीने में उनका उत्तरप्रदेश का यह तीसरा दौरा है। मोदी वाराणसी में एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे।

पुलवामा के शहीदों के परिवार से मिल सकते हैं प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री पुलवामा में शहीद हुए रमेश यादव और अवधेश यादव के परिवार से मुलाकात कर सकते हैं। यहां से वे औढ़े गांव जनसभा स्थल पहुंचेंगे। फरवरी में मोदी का यह तीसरा उत्तरप्रदेश दौरा है। इससे पहले 11 फरवरी को वे वृंदावन और नोएडा, जबकि 17 फरवरी को झांसी पहुंचे थे। इसके बाद 24 फरवरी को गोरखपुर और 27 फरवरी को कांग्रेस के गढ़ अमेठी जाएंगे।

वाराणसी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 नवम्बर को अपने संसदीय क्षेत्र को बड़ी सौगात देने जा रहे हैं। इस दिन वह वाराणसी से हलदिया के बीच जलमार्ग शुरू करने के लिए बनारस में बने मल्टी मॉडल टर्मिनल का उद्घाटन करेंगे। इस मौके पर केंद्रीय सड़क एवं जहाज रानी मंत्री नीतिन गडकरी, राज्यपाल राम नाईक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद रहेंगे। हरहुआ तिराहे पर एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।

बनारस में बने मल्टी मॉडल टर्मिनल को जलमार्ग विकास प्रोजेक्ट के तहत बनाया गया है। इसके शुरू होने के बाद वाराणसी-हलदिया के बीच भारी मालवाहक पोतों के आवागमन का सिलसिला शुरू हो जाएगा। इसको पूरी तरह से पर्यावरण फ्रेंडली बनाया गया है। इसकी लागत 5369.18 करोड़ रुपए है। इसका 50 फीसदी हिस्सा भारत सरकार ने दिया है, जबकि बाकी का 50 फीसदी विश्व बैंक ने दिया है। इसका निमार्ण 33 हेक्टेयर क्षेत्र में किया गया है। वाराणसी से हलदिया के बीच इस तरह के तीन टर्मिनल होंगे। दूसरा साहेबगंज और तीसरा हलदिया में होगा।

इसके अतिरिक्त पीएम मोदी वाराणसी से पूर्वांचल के विभिन्न जिलों के लिए निकलने वाले दो राष्ट्रीय राजमार्गों को भी देश को समर्पित करेंगे। इनकी लम्बाई 34 किलोमीटर होगी जबिक इसे बनाने में 1571.95 करोड़ रुपए की लागत आई है।

Wednesday, February 13, 2019

ऑटोमेटिक टॉयलेट और वाटर एटीएम से स्मार्ट बनते स्लम

शहरीकरण की वजह से दुनिया भर के शहरों में स्लम (झुग्गी-झोपड़ियों वाली बस्तियां) तेज़ी से फैल रही हैं. माना जाता है कि आज दुनिया की एक अरब आबादी झुग्गियों मे रहती है और इनकी हालत बेहद ख़राब है.

जाने-माने लेखक चार्ल्स डिकेंस ने न्यूयॉर्क के मशहूर या यूं कहें कि बदनाम झुग्गी 'फ़ाइव प्वाइंट्स' के बारे में लिखा था कि, 'ये एक तरह का चौकोर मकानों का कोण है.' ये बात 1842 की है, तब फ़ाइव प्वाइंट्स की झुग्गी बीमारियों, जुर्म और न जाने कितनी बुराइयों का अड्डा मानी जाती थी. बाद में उस बस्ती को नेस्तनाबूद कर दिया गया. आज उसकी जगह न्यूयॉर्क के बेहद महंगे मकान बना दिए गए हैं.

जब से दुनिया में शहरीकरण बढ़ा, तब से इनसे निपटने का एक ही तरीक़ा आज़माया जाता रहा है, वो है इनको उजाड़ना और इनकी जगह बेहतर सुविधाएं या मकान बनाना. जैसे कि फ़ाइव प्वाइंट्स स्लम की जगह पार्क, सरकारी इमारतें और निजी मकान बना दिए गए.

पढ़ें- झुग्गी के बच्चों को संगीत सीखा रहे हैं रहमान

वैसे, इन झुग्गियों के उजाड़ने से किसी को क्या दिक़्क़त होगी. लेकिन, स्लम से निपटने के इस तरीक़ों से एक बड़ा सवाल उठता है, वो ये कि इन बस्तियों में रहने वाले कहां जाएंगे?

न्यूयॉर्क की झुग्गी 'फ़ाइव प्वाइंट्स' से जब हज़ारों झुग्गियां उजाड़ी गईं, तो उनकी जगह अदालत की इमारतें और पार्क बना दिए गए. लेकिन, सरकार के इस क़दम से उज़ड़े लोगों के लिए कोई योजना ही नहीं थी.

जिस तरह से आज लोग शहरों की तरफ़ भाग रहे हैं और जलवायु परिवर्तन की वजह से भगदड़ मची है, उससे तय है कि दुनिया में झुग्गी-बस्तियों की तादाद बढ़ेगी.

हाल ही में अफ्रीकी देश कीनिया के सबसे बड़े स्लम एरिया किबेरा को उजाड़ दिया गया. इससे 20 हज़ार लोग बेघर हो गए.

अब हर झुग्गी बस्ती को उजाड़ा तो नहीं जा सकता. फिर, इनमें आबाद लोगों को बेहतर ज़िंदगी देने का तरीक़ा क्या है?

ऐसे में अब झुग्गियों को ही बेहतर बनाने का नया दौर है. दुनिया के कई शहरों में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, जिनसे झुग्गियों में रहने वालों की ज़िंदगी को बेहतर बनाया जा रहा है.

झुग्गी बस्तियों में सड़कें बनाई जा रही हैं. पीने के पानी की पाइपलाइन बिछाई जा रही है. मज़बूत मकान बनाए जा रहे हैं. लोगों को अपने मकान बनाने की इजाज़त दी जा रही है. उनकी बीमारियों के इलाज के लिए बेहतर सुविधाएं स्लम तक पहुंचाई जा रही हैं. इन तरीक़ों से झुग्गियों को आज किसी दूसरी बस्ती जैसा बनाने की कोशिश की जा रही है.

ब्रिटेन की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी में शहरीकरण की एक्सपर्ट डायना मिटलिन कहती हैं कि, 'स्लम असुरक्षित और अस्थायी ज़िंदगी के प्रतीक हैं. लेकिन, उनमें ज़िंदगी स्थायी रूप से आबाद रहती है. बहुत से लोग ऐसे हैं जो 40 बरस से स्लम में रहते आए हैं. ऐसे में आज ये सोच उभरी है कि हमें उनकी मदद करनी चाहिए.'

ये दान से कल्याण का मामला नहीं है. झुग्गियों में रहने वाले लोग ग़रीब भले हों, मगर उनसे भी कुछ कमाई हो सकती है. आख़िर आज दुनिया का हर सातवां इंसान झुग्गियों का बाशिंदा है. अब कारोबार जगत के कई लोग झुग्गियों में रहने वालों की ज़िंदगी बेहतर बनाने में अपने लिए मुनाफ़ा तलाश रहे हैं.

पढ़ें- झुग्गी के जीवन में रंग भरती कला

अब शौचालय को ही ले लीजिए. आम तौर पर किसी भी झुग्गी बस्ती के साथ बड़ी चुनौती ये होती है कि वो शहरों की बुनियादी सुविधाओं से वंचित होती हैं. वहां, सीवर लाइन नहीं होती. पीने के पानी की लाइन नहीं होती. बिजली के तार नहीं पहुंचे होते.

ऑटोमेटिक टॉयलेट की एक नई कोशिश

मुंबई के मयंक मिढा झुग्गियों में ही पले बढ़े. मयंक कहते हैं कि, 'झुग्गियों में बड़े होते हुए मैंने शौचालयों की भारी कमी देखी है.' मयंक शुरू से इसे बदलने के लिए कुछ करना चाहते थे. उन्हें एक मौक़ा साल 2014 में मिला. इस वक्त वो एक टेलीकॉम कंपनी में काम कर रहे थे. एक दिन काम करते हुए उनकी नज़र एक टॉवर के नीचे लगने वाले मेटल बॉक्स पर पड़ी. उन्हें लगा कि ये तो शानदार शौचालय का काम कर सकता है.

लेकिन, वो सिर्फ़ एक शौचालय भर हो, इससे काम नहीं चलने वाला था. पहले भी झुग्गियों में थोड़े-बहुत शौचालय हुआ करते थे. लेकिन, उनकी देख-रेख ठीक से नहीं होती थी. अक्सर उन्हें तोड़-फोड़ डाला जाता था. मयंक बताते हैं कि, 'हम ने सोचा कि हम अगर इस शौचालय को ऑटोमैटिक बना दें और इसकी निगरानी करें, तो हम इन चुनौतियों से पार पा सकते हैं.'

इसके बाद मयंक ने 'गर्व टॉयलेट्स' नाम की संस्था की शुरुआत की.

कई साल की कोशिश के बाद उनकी कंपनी ने गर्व टॉयलेट नाम का शौचालय विकसित किया है. इसे तोड़ा-फोड़ा नहीं जा सकता. इन शौचालयों में सेंसर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण लगे हैं. इससे शौचालय इस्तेमाल होने पर फ़ौरन फीडबैक मिलता है. किसी ने फ्लश नहीं चलाया तो पता चल जाता है. या किसी ने हाथ नहीं धोए तो उसकी ख़बर भी हो जाती है.

पढ़ें- वीडियो झुग्गी बस्तियों में कितनी सुरक्षित हैं महिलाएं-

अब मयंक मिढा ने देश भर में ऐसे कई शौचालय लगाए हैं. वो अब इन्हें अफ्रीकी देश घाना में भी स्थापित करने जा रहे हैं. घाना की ज़्यादातर आबादी स्लम में ही रहती है. जहां लोग बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं.

मुनाफ़े की तलाश में जुटे कारोबारियों और ग़रीबों और सुविधाओं से वंचित लोगों के बीच तालमेल में अपार संभावनाएं हैं.

एक हक़ीक़त ये है कि आप दान के भरोसे कल्याण की उम्मीद नहीं कर सकते. मसलन, अमरीका की ट्रम्प सरकार ने 2017 में दूसरे देशों को दी जाने वाली मदद में 32 फ़ीसद की कटौती का एलान किया था. इसी तरह ब्रितानी सरकार ने विकासशील देशों की मदद में ख़र्च की जाने वाली रक़म में कटौती की चेतावनी दी है.

Tuesday, February 5, 2019

प्लास्टिक की ये नई नस्ल बदल सकती है दुनिया

इंसान ने क़रीब एक सदी पहले प्लास्टिक ईजाद किया ताकि क़ुदरत को अपनी ज़रूरतों से हो रही तबाही से बचा सके. लेकिन, आज की तारीख़ में प्लास्टिक ने ही धरती पर तबाही ला दी है.

समंदर, प्लास्टिक के कचरे के ढेर में तब्दील हो रहे हैं. प्लास्टिक की वजह से इंसान मर रहे हैं, दूसरे जीव-जंतुओं की जान जा रही है. लेकिन, प्लास्टिक इतने ज़रूरी बन गए हैं कि आज इनके बिना ज़िंदगी की कल्पना मुमकिन नहीं.

इनके क़ुदरती विकल्पों से इंसान की ज़रूरतें पूरी नहीं की जा सकतीं.

तो, अब इंसान की लाई इस तबाही का हल क्या है?

ज़ाहिर है हमें क़ुदरत से ही इस मुश्किल का रास्ता मिल सकता है. एक रास्ता दिखा रहे हैं तुर्की के तीन युवा.

वो मशहूर सूफ़ी संत रूमी का हवाला देते हैं कि, "जब आप चलना शुरू कर देते हैं, तो रास्ता ख़ुद ब ख़ुद बनने लगता है."

वो बताते हैं कि हमारा साझा ख़्वाब ही हमें इस कारोबारी रास्ते पर ले कर चल पड़ा. तुर्की के ये तीन युवा आज जैतून के बीजों से प्लास्टिक तैयार करने का नुस्खा लेकर आए हैं. इस्तांबुल के रहने वाले ये युवा आज जैतून के बीजों से बायोप्लास्टिक तैयार कर के दुनिया को नई राह दिखा रहे हैं.

ये लोग जैतून के बीज में पाए जाने वाले सेल्यूलोज़ की मदद लेते हैं. इसकी प्रेरणा इस टीम के सदस्य दुग्यू यिलमाज़ के पिता से मिली थी.

साथी उस वक़्त को याद कर के कहते हैं कि एक दिन यिल्माज़ ने बताया कि उनके पिता की एक अजीब आदत थी. वो जैतून के बीज चबा जाया करते थे.

इस अजब आदत पर बातचीत करते हुए तीनों दोस्तों को एक नया आइडिया आया. यिल्माज़ के अलावा इस टीम के दो अन्य सदस्य हैं, मेहमत अमीन ओज़ और अहमत फ़तीह अयास.

वो कहते हैं कि हमारा उत्पाद इसलिए ख़ास है क्योंकि हम इसे जैतून के तेल के कारखानों से निकलने वाले कचरे को रिसाइकिल कर के बनाते हैं. यानी हम धरती और पर्यावरण को संरक्षित करते हुए विकास करने में अपना योगदान देते हैं.

इन तीनों की कंपनी जो बायोप्लास्टिक बनाती है उसका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स और फूड पैकेजिंग उद्योग में होता है.

जैतून के बीजों से तैयार होने वाला एक किलो बायोप्लास्टिक, 6 किलोग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन कम करता है.

अहमत बताते हैं कि उनका परिवार गांव में रहता था. वो अपने भाई के साथ बचपन में ही छोटे-मोटे औज़ार बनाते थे. वहीं मेहमत बताते हैं कि उनका जन्म छोटे से क़स्बे कोन्या में हुआ था. वो मछलियों को पकड़ कर उन्हें बोतल में बंद करके घर लाते थे. और फिर बड़े से एक्वेरियम में छोड़ देते थे.

मेहमत कहते हैं कि जब वो अपने छोटे से क़स्बे से इस्तांबुल आए तो उन्हें लगा कि वो एक बड़े से एक्वेरियम में आ गए हैं.

तीनों दोस्तों ने मिलकर पहले एक छोटी सी प्रयोगशाला खोली थी. यहां उनके कई तजुर्बे फेल हो गए. लेकिन, तीनों दोस्तों ने अपनी कोशिशें जारी रखीं और आख़िर में वो एक नमूना बनाने में कामयाब हो गए.

इस साल वो अपने इस नमूने को अमरीका की सिलिकॉन वैली लेकर गए. उन्हें इस प्रयोग के लिए कई अवार्ड मिले. कई निवेशक उनके उत्पाद को आगे बढ़ाने के लिए पैसे लगाने को तैयार हो गए.

इनकी टीम ने 5 टन जैतून के बीजों से 3.5 टन बायोप्लास्टिक तैयार करके दिखा दिया है कि इरादे मज़बूत हों तो मंज़िल मिल ही जाती है.

प्लास्टिक जिस तेज़ी से हमारी सभ्यता ही नहीं, पूरी धरती के लिए ख़तरा बनता जा रहा है, उससे ऐसा लगता है कि आने वाले वक़्त में समुद्र में ऐसे ही कचरा जमा हुआ, तो जीवन मुश्किल हो जाएगा.

ये बात जानने के बाद अहमत, मेहमत और यिल्माज़ को लगता है कि उनका प्रोजेक्ट केवल उन तीनों के लिए ही नहीं, बल्कि बाक़ी दुनिया के लिए भी अहम है. ये इंसानियत को सलामत बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा क़दम साबित हो सकता है.

Sunday, February 3, 2019

पाकिस्तान में हज सब्सिडी पर क्यों मचा हुआ है हंगामा- उर्दू प्रेस रिव्यू

पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ़्ते भारत-प्रशासित कश्मीर, हज सब्सिडी और अफ़ग़ानिस्तान का मुद्दा छाया रहा.

सबसे पहले बात हज सब्सिडी की.

पाकिस्तान में इन दिनों हज के ख़र्च में हुई बढ़ोत्तरी का मुद्दा भी छाया हुआ है. इमरान ख़ान की सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस हफ़्ते अपनी पहली हज पॉलिसी जारी की.

इसके तहत अब एक पाकिस्तानी को इस साल हज पर जाने के लिए चार लाख 76 हज़ार पाकिस्तानी रुपए देने होंगे जबकि पिछले साल ये रक़म दो लाख 80 हज़ार रुपए थे.

इसको लेकर पाकिस्तानी संसद में ख़ूब हंगामा हुआ.

अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार विपक्षी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के एक सांसद मुश्ताक़ अहमद ने कहा कि सरकार ने हज यात्रियों पर ड्रोन हमला किया है.

सांसद ने कहा कि सरकार ने हज पर कोई सब्सिडी नहीं दी. उनके अनुसार धार्मिक मामलों के मंत्री ने अपनी रिपोर्ट में हज सब्सिडी देने की अपील की थी लेकिन इमरान ख़ान की सरकार ने अपने ही मंत्री की सिफ़ारिश को ठुकरा दिया.

अख़बार लिखता है कि सांसद मुश्ताक़ अहमद ने सरकार पर चुटकी लेते हुए कहा, ''मदीना की रियासत क़ायम करने का दावा करने वाले लोग, अब लोगों को मक्का और मदीना जाने से रोक रहे हैं.''

ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले भाषण में कहा था कि इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद ने जिस तरह से मदीना में शासन किया थी उसी तर्ज़ पर वो पाकिस्तान को चलाना चाहते हैं.

विपक्ष के हमले का जवाब देते हुए संसदीय कार्य मंत्री अली मोहम्मद ख़ान ने कहा कि सऊदी अरब में ही हज का ख़र्च बढ़ गया है इसलिए हज यात्रियों से ज़्यादा पैसे लिए जा रहे हैं. लेकिन अख़बार जंग के अनुसार धार्मिक मामलों के मंत्री नूरुल हक़ क़ादिरी ने कहा कि ''रियासत-ए-मदीना का मतलब ये नहीं कि लोगों को मुफ़्त में या सब्सिडी देकर हज कराया जाए.''

वहीं, पाकिस्तान ने कहा है कि भारत प्रशासित कश्मीर में रह रहे लोगों के समर्थन में ब्रितानी संसद में एक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा.

अख़बार 'डेली ख़बरें' के अनुसार चार फ़रवरी को ऑल पार्टी पार्लियामेंट्री ग्रुप के तहत ब्रितानी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ़ कॉमन्स में भारत प्रशासित कश्मीर में रह रहे लोगों के समर्थन में एक ख़ास प्रोग्राम आयोजित किया जाएगा. इसमें पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी भी हिस्सा लेंगे.

अख़बार के अनुसार भारत ने इस कार्यक्रम को रोकने के लिए ब्रिटेन से एक ख़त लिखकर अपील की थी लेकिन ब्रिटेन की सरकार ने इस अपील को ठुकरा दिया.

अख़बार 'डेली ख़बरें' लिखता है कि नई दिल्ली स्थित ब्रितानी दूतावास के एक प्रवक्ता ने बयान जारी कर कहा है कि ब्रितानी सांसद किससे मिलते हैं और क्या बात करते हैं ये उनका अधिकार है, ब्रिटेन की सरकार इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती है.

अख़बार लिखता है कि ब्रितानी विदेश मंत्रालय ने एक प्रेस रिलीज़ जारी कर कहा है कि चार फ़रवरी के प्रोग्राम के बाद लंदन में एक प्रदर्शनी होगी जिसमें भारतीय कश्मीर में होने वाले कथित मानवाधिकार उल्लंघन को उजागर किया जाएगा.

ब्रितानी प्रवक्ता ने कहा कि ब्रिटेन को इस बात की जानकारी है कि चार फ़रवरी के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पाकिस्तानी विदेश मंत्री क़ुरैशी लंदन आ रहे हैं लेकिन ये उनका निजी दौरा है और इस दौरान ब्रितानी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री से उनकी कोई मुलाक़ात नहीं होगी.

ग़ौरतलब है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने 29 जनवरी को भारत प्रशासित कश्मीर में सक्रिय हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस के नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ से फ़ोन पर बात की थी और कहा था कि उनकी सरकार हर अंतरराष्ट्रीय फ़ोरम पर भारतीय कश्मीर क मुद्दा उठाएगी.

भारत ने इस पर सख़्त विरोध जताते हुए भारत में मौजूद पाकिस्तानी उच्चायुक्त को विदेश मंत्रालय के दफ़्तर तलब किया था. अख़बार के अनुसार जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तानी विदेश सचिव तहमीना जंजुआ ने भी इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायुक्त को अपने ऑफ़िस तलब किया था.

अमरीका और तालिबान के बीच समझौते से जुड़ी ख़बरें भी पूरे हफ़्ते अख़बारों में छाई रहीं.

अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार तालिबान प्रवक्ता ज़बीहउल्लाह मुजाहिद ने कहा कि अमरीकी राष्ट्रपति अफ़ग़ानिस्तान से अपनी फ़ौज को वापस बुलाने के लिए गंभीर हैं.

तालिबान प्रवक्ता ने कहा कि अमरीकी सेना की वापसी के बाद तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामी क़ानून लागू करेंगे लेकिन ये सभी राजनीतिक दलों से विचार विमर्श के बाद लागू किया जाएगा. उन्होंने कहा कि अब तालिबान महिलाओं की शिक्षा और नौकरी करने के ख़िलाफ़ नहीं हैं और उनकी सरकार ऐसा माहौल बनाने की पूरी कोशिश करेगी ताकि अफ़ग़ानिस्तान की महिलाएं ख़ुद को सुरक्षित समझ कर काम कर सकें.

अख़बार के अनुसार तालिबान प्रवक्ता ने कहा कि अमरीका से अगले दौर की बातचीत 25 फ़रवरी को दोहा में होगी लेकिन अमरीका की तरफ़ से अभी तारीख़ की पुष्टि नहीं हुई है.

Friday, February 1, 2019

टैक्स पेयर्स को मोदी सरकार की बड़ी सौगात, 5 लाख रुपए तक इनकम टैक्स फ्री

लोकसभा चुनाव के पहले मोदी सरकार अंतरिम बजट पेश कर रही है। आमतौर पर चुनावी साल में पेश होने वाले बजट से आम लोगों को काफी आशा रहती है। इस बार भी कुछ ऐसा ही है लेकिन अब ये साफ हो चुका है कि यह आम बजट होने की बजाए अंतरिम बजट (interim budget) होगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली इलाज के लिए देश से बाहर हैं। उनकी जगह पीयूष गोयल (piyush goyal) यह बजट (budget) पेश कर रहे हैं। जैसा कि अंतरिम बजट में होता है उसी तरह इस अंतरिम बजट में पूरे वित्त वर्ष के लिए संभावित आय-व्यय का अनुमान पेश किया जाएगा, लेकिन शुरुआती कुछ महीनों के खर्चे के लिए ही मंजूरी मांगी जाएगी। मोदी सरकार (narendra modi government) फिलहाल आर्थिक सर्वेक्षण पेश नहीं करेगी। लोकसभा चुनाव के बाद जो सरकार आएगी, वह जुलाई में आर्थिक सर्वेक्षण और पूर्ण बजट पेश करेगी। बजट को लेकर यह चर्चा है कि मोदी सरकार परंपरा के उलट आयकर छूट (income tax slab) की सीमा बढ़ा सकती है। इसके अलावा किसानों के लिए राहत पैकेज के ऐलान की भी संभावना है। बता दें कि पहले ये माना जा रहा था कि मोदी सरकार पूर्ण बजट ही पेश करेगी। लेकिन इस तरह की अटकलों पर विपक्ष ने निशाना साधा था। कांग्रेस ने भी कहा था कि वह संसद के अंदर और बाहर इसका विरोध करेगी। वैसे चुनावी साल में सरकार अंतरिम बजट ही पेश करती है। लेकिन, इस बार चर्चा थी कि मोदी सरकार 70 साल पुरानी परंपरा को बदल कर पूर्ण बजट पेश कर सकती है। बजट 2019 सुबह 11 बजे के करीब ( budget 2019 time) पेश किया जाएगा।

बजट से आशाएं (Budget 2019 Expectations)

बजट से सबसे ज्यादा आशाएं मध्यमवर्ग को ही होती हैं। इसके अलावा किसानों और इंडस्ट्री को भी राहत की उम्मीद रहती है। चूंकि ये अंतरिम बजट 2019 (interim budget 2019) होगा इसलिए केंद्र सरकार इन मुद्दों पर क्या करेगी ये देखना होगा। आशा तो ये कि जा रही है कि आयकर छूट का दायरा बढ़ाकर 3 लाख किया जा सकता है। एक मांग यह भी उठी थी कि सीनियर सिटीजंस के लिए आयकर छूट का दायरा 3.5 लाख किया जाए। किसानों को बजट में सरकार क्या लाभ देती है, ये देखना होगा। इसके अलावा कारोबारी वर्ग जीएसटी को सरल बनाने की मांग कर रहा है। विपक्ष भी सरकार को इस मसले पर घेरता रहा है। महिलाओं की रसोई को महंगाई से कुछ राहत मिलने की आशा रहेगी।

आयकर में मिलेगी राहत?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस अंतरिम बजट 2019 में (interim budget 2019) आयकर ( income tax) में छूट का दायरा 2.5 लाख रुपए से बढ़ाकर 3 लाख रुपए तक किया जा सकता है। लोकसभा चुनाव नज़दीक है लिहाज़ा इस बात की पूरी संभावना है कि इनकम टैक्स में छूट का दायरा बढ़ाया जा सकता है। भी 2.5 लाख से 5 लाख रुपए तक की आय पर 5 फीसदी टैक्स देना पड़ता है। जबकि 5 लाख रुपए से 10 लाख रुपए तक की इनकम पर 20 फीसदी टैक्स तय है। अगर आपकी आय 10 लाख रुपए से ज्यादा है तो 30 फीसदी इनकम टैक्स लगाया जाता है।

रेलवे बजट (railway budget 2019)

पीयूष गोयल रेलमंत्री भी हैं। इसलिए माना जा रहा है कि अंतरिम बजट में वो रेलवे को लेकर भी कुछ खास घोषणाएं कर सकते हैं। वैसे इस बात की संभावना कम ही है कि यात्रा किराया या फिर माल की ढुलाई पर लगने वाले चार्ज में कुछ राहत दी जाएगी। नई ट्रेनों की घोषणा भी मुमकिन नहीं है। सरकार काफी पहले ही साफ कर चुकी है उसका जोर रेलवे की सेवाओं को बेहतर बनाने पर ज्यादा है। हालांकि, ये माना जा रहा है कि ट्रेन 18 जैसी नई रेलवे परियोजनाओं को लेकर कोई घोषणा इस अंतरिम बजट में की जाए।

ويشرح فواز هذه النقطة بالقول

أثارت تلك الحادثة نوعا من الزخم أثناء نقاش الموضوع حينها. وبعدها بناجة أم عبد الله المة فعيكية حذت الاباحية الجنس & أنيل الجنس جمع المت...