एक जनवरी को हर साल देशभर के दलित समुदाय के लोग भीमा कोरेगांव स्थित विजय स्तंभ (युद्ध समारक) के नज़दीक इकट्ठा होते हैं.
यहां इकट्ठा होकर ये लोग तीसरे एंगलों-मराठा युद्ध में जीतने वाली महार रेजिमेंट को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. भीमा कोरेगांव की इस लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की महार रेजिमेंट ने मराठाओं को हरा दिया था. उस वक़्त महार समुदाय को महाराष्ट्र में अछूत समझा जाता था.
पिछले साल इस लड़ाई के दो सौ साल पूरे होने के मौक़े पर हो रहे जश्न में हिंसा भड़क गई थी. जिसकी चपेट में आस-पास के इलाक़े आए थे. हिंसा में एक व्यक्ति की मौत के बाद पूरे राज्य में ज़ोरदार प्रदर्शन हुए थे.
इस साल के आयोजन के लिए पुणे ज़िला प्रशासन ने किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोकने के लिए ख़ास इंतज़ाम किए हैं. पुणे के ज़िला कलेक्टर नवल किशोर राम ने इस बारे में जानकारी दी.
हम पिछले दो महीने से तैयारियों में जुटे हैं. हम पांच से दस लाख लोगों की भीड़ को आराम से संभाल सकते हैं.
पार्किंग के लिए 11 स्लॉट बनाए गए हैं. आयोजन में आने वाले लोगों को गाड़ियां यहीं लगानी होंगी. यहां से स्मारक तक वो हमारी गाड़ियों में जाएंगे. इसके लिए हमने 150 बसों का इंतज़ाम किया है. इसके अलावा पानी के 100 टैंक भी लगाए जाने हैं.
स्मारक और उसके पास के 7-8 किलोमीटर के इलाक़े में सीसीटीवी लगाए गए हैं. निगरानी के लिए ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल भी किया जाएगा. भीमा कोरेगांव को जाने वाली सड़कों को दुरुस्त कर दिया गया है और जगह-जगह पर शौचालय बनाए गए हैं.
क्या पिछले साल हुई हिंसा की वजह से इलाके के लोगों में डर है?
इस बार हमने लोगों से बेहतर तालमेल किया है. डर के माहौल को ख़त्म करने के लिए हमने आस-पास के गांववालों के साथ बैठकें की हैं.
मैंने ख़ुद 15-20 बैठकें की हैं और भीमा कोरेगांव की स्थिति पर नज़र बनाए रखी है. लोग डरे हुए नहीं हैं. वो हमारा काम देखकर ख़ुश हैं.
रैली की इजाज़त किन-किन आयोजकों को मिली है?
पांच से छह आयोजकों ने रैली की इजाज़त मांगी थी. उन सब को इजाज़त दे दी गई है. इन्होंने कुछ दिन पहले इजाज़त मांगी थी और उन्हें तुरंत दे भी दी गई थी.
पिछले साल की हिंसा को देखते हुए क्या इस बार भी रैली की इजाज़त देना जोखिम भरा नहीं है?
हमने मुख्य स्थान पर रैली की इजाज़त नहीं दी है. आयोजक स्मारक से 500 मीटर की दूरी पर ही रैली कर सकेंगे.
रैली के लिए क्या कुछ शर्तें भी तय की गई हैं?
रैली में किसी तरह के भड़काऊ और विभाजनकारी भाषण देने की मनाही है. सभी आयोजकों को कोड ऑफ कंडक्ट का पालन करना होगा और अगर वो ऐसा नहीं करते, तो उनके ख़िलाफ़ तुरंत सख़्त कार्रवाई की जाएगी.
ख़बर है कि पिछले साल की हिंसा के अभियुक्त पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.
जिन लोगों पर एक जनवरी 2018 को हुई हिंसा के मामले में केस दर्ज हुआ है, उन पर प्रतिबंध लगाया गया है.
क्या संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे पर भी प्रतिंबध लगाया गया है?
पुलिस हिंसा के अभियुक्तों पर कार्रवाई कर रही है. मेरे पास किसी ख़ास इंसान या संस्था का नाम तो नहीं है, लेकिन कोई भी अभियुक्त भीमा कोरेगांव नहीं आ सकता.
Monday, December 31, 2018
Wednesday, December 26, 2018
Gunjan Saxena First Look Viral: जाह्नवी कपूर को ऐसे देखना दिलचस्प
एक्ट्रेस श्रीदेवी की बेटी Janhvi kapoor ने बॉलीवुड में इस साल फिल्म धड़क के साथ दमदार शुरुआत की. फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया था. समीक्षकों ने भी जाह्नवी के काम की तारीफ की थी. धड़क के बाद जाह्नवी, करण जौहर की मल्टीस्टारर फिल्म तख्त में नजर आने वाली हैं. इस बीच जाह्नवी एक बायोपिक भी करने जा रही हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक बायोपिक IAF पायलट गुंजन सक्सेना पर बन रही है. फिल्म से जाह्नवी का पहला लुक सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.
धड़क के साथ ही फिल्म इंडस्ट्री में जाह्नवी की पहचान एक एक्ट्रेस के तौर पर मजबूत हुई है. हालांकि Janhvi kapoor स्टारर बायोपिक फिल्म को लेकर कोई ऑफिशियल अनाउंनसमेंट नहीं हुई है. लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल एक तस्वीर को लेकर दावा किया जा रहा है कि ये फिल्म में जाह्नवी का लुक यही है. वैसे एक्ट्रेस का ट्रेडिशनल लुक काफी इम्प्रेसिव है. रिपोर्ट्स की मानें तो फिल्म की कहानी काफी अच्छी है. इसके बैकड्रॉप में कारगिल की लड़ाई है.
कौन है गुंजन सक्सेना?
गुंजन सक्सेना करगिल युद्ध के दौरान पहली भारतीय महिला आईएएफ पायलट थीं. एक मुश्किल जंग के दौरान उन्होंने जंग में बहादुरी से दुश्मनों का सामना किया था. इसके साथ जख्मी सैनिकों को करगिल से अस्पताल पहुंचाने में भी बड़ी मदद की. उनके इस साहस के लिए गुंजन को सक्सेना को शौर्य चक्र से भी सम्मानित किया गया था.
Rajkummar Rao और मौनी रॉय अभिनीत Made in China पहले 15 अगस्त को रिलीज होने जा रही थी. लेकिन अब फिल्म की रिलीज डेट को शिफ्ट कर दिया गया है. खबरों के मुताबिक रिलीज की तारीख बदलते हुए अब यह फिल्म एक्टर राजकुमार राव के जन्मदिन से एक दिन पहले यानी 30 अगस्त, 2019 को रिलीज होगी. 'स्त्री' फेम एक्टर का जन्मदिन 31 अगस्त को होता है.
हालांकि फिल्म की रिलीज डेट को 30 अगस्त क्यों रखा गया है इसका खुलासा नहीं हुआ है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि राजकुमार की इस साल की हिट फिल्म 'स्त्री' भी इसी (31 अगस्त, 2018) के आसपास ही रिलीज हुई थी."वैसे 'मेड इन चाइना' मिखिल मुसले द्वारा निर्देशित है और यह मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले दिनेश विजान द्वारा निर्मित है.बताते चलें कि राजकुमार के लिए 2018 का साल बहुत बेहतरीन साबित हुआ है.
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म में राजकुमार एक संघर्षरत गुजराती व्यवसायी के रूप में दिखेंगे और मौनी उनकी पत्नी के किरदार में दिखेंगी. गुजराती निर्देशक मिखिल मुसले की यह पहली बॉलीवुड फिल्म है. वर्ष 2016 की उनकी गुजराती थ्रिलर-फिल्म 'रॉन्ग साइड राजू' को सर्वश्रेष्ठ गुजराती फीचर फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
बता दें राजकुमार राव के लिए साल 2018 सफलता के नए आयाम लेकर आया है. उनकी कई फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया. इनमें न्यूटन, स्त्री जैसी फिल्में शामिल हैं. साल 2019 में राजकुमार राव सोनम कपूर के साथ फिल्म एक लड़की को देखा... में नजर आने वाले हैं.
धड़क के साथ ही फिल्म इंडस्ट्री में जाह्नवी की पहचान एक एक्ट्रेस के तौर पर मजबूत हुई है. हालांकि Janhvi kapoor स्टारर बायोपिक फिल्म को लेकर कोई ऑफिशियल अनाउंनसमेंट नहीं हुई है. लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल एक तस्वीर को लेकर दावा किया जा रहा है कि ये फिल्म में जाह्नवी का लुक यही है. वैसे एक्ट्रेस का ट्रेडिशनल लुक काफी इम्प्रेसिव है. रिपोर्ट्स की मानें तो फिल्म की कहानी काफी अच्छी है. इसके बैकड्रॉप में कारगिल की लड़ाई है.
कौन है गुंजन सक्सेना?
गुंजन सक्सेना करगिल युद्ध के दौरान पहली भारतीय महिला आईएएफ पायलट थीं. एक मुश्किल जंग के दौरान उन्होंने जंग में बहादुरी से दुश्मनों का सामना किया था. इसके साथ जख्मी सैनिकों को करगिल से अस्पताल पहुंचाने में भी बड़ी मदद की. उनके इस साहस के लिए गुंजन को सक्सेना को शौर्य चक्र से भी सम्मानित किया गया था.
Rajkummar Rao और मौनी रॉय अभिनीत Made in China पहले 15 अगस्त को रिलीज होने जा रही थी. लेकिन अब फिल्म की रिलीज डेट को शिफ्ट कर दिया गया है. खबरों के मुताबिक रिलीज की तारीख बदलते हुए अब यह फिल्म एक्टर राजकुमार राव के जन्मदिन से एक दिन पहले यानी 30 अगस्त, 2019 को रिलीज होगी. 'स्त्री' फेम एक्टर का जन्मदिन 31 अगस्त को होता है.
हालांकि फिल्म की रिलीज डेट को 30 अगस्त क्यों रखा गया है इसका खुलासा नहीं हुआ है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि राजकुमार की इस साल की हिट फिल्म 'स्त्री' भी इसी (31 अगस्त, 2018) के आसपास ही रिलीज हुई थी."वैसे 'मेड इन चाइना' मिखिल मुसले द्वारा निर्देशित है और यह मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले दिनेश विजान द्वारा निर्मित है.बताते चलें कि राजकुमार के लिए 2018 का साल बहुत बेहतरीन साबित हुआ है.
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म में राजकुमार एक संघर्षरत गुजराती व्यवसायी के रूप में दिखेंगे और मौनी उनकी पत्नी के किरदार में दिखेंगी. गुजराती निर्देशक मिखिल मुसले की यह पहली बॉलीवुड फिल्म है. वर्ष 2016 की उनकी गुजराती थ्रिलर-फिल्म 'रॉन्ग साइड राजू' को सर्वश्रेष्ठ गुजराती फीचर फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
बता दें राजकुमार राव के लिए साल 2018 सफलता के नए आयाम लेकर आया है. उनकी कई फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया. इनमें न्यूटन, स्त्री जैसी फिल्में शामिल हैं. साल 2019 में राजकुमार राव सोनम कपूर के साथ फिल्म एक लड़की को देखा... में नजर आने वाले हैं.
Sunday, December 16, 2018
भूपेश बघेल होंगे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री
भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के नये मुख्यमंत्री होंगे. रविवार को विधायक दल की बैठक के बाद पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनके नाम की घोषणा की.
राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री के तौर पर वो सोमवार (17 दिसंबर) को रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में शपथ लेंगे. शपथग्रहण की तैयारी पूरी कर ली गई है.
इससे पहले मुख्यमंत्री पद के दूसरे दावेदार टीएस सिंहदेव ने बघेल और खुद को 'जय-वीरू की जोड़ी' बताते हुये शोले का गीत 'तेरे जैसा यार कहां' और 'ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे' को दोहराते हुये दावा किया कि वो कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे.
विधानसभा में प्रतिपक्ष के उपनेता रहे आदिवासी विधायक कवासी लखमा ने कहा, "छत्तीसगढ़ के एक किसान के बेटे को मुख्यमंत्री बनाकर हमारी पार्टी ने संदेश दिया है कि राज्य के गरीब, आदिवासी और किसान सुरक्षित हैं. हमारे बस्तर के विकास का रास्ता साफ़ हो गया है."
कैसे तय हुआ नाम
दिल्ली में पिछले तीन दिन से कई दौर की बैठक के बाद रविवार की सुबह ही भूपेश बघेल के अलावा पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे और छत्तीसगढ़ के प्रभारी पीएल पुनिया समेत दूसरे नेता रायपुर पहुंचे थे.
इस घोषणा के साथ ही पिछले कई दिनों से पार्टी के भीतर चला आ रहा गतिरोध खत्म हो गया है.
माना जा रहा है कि रायपुर से लेकर दिल्ली तक पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ कई-कई दौर की बैठकों के बाद शनिवार को ही भूपेश बघेल का नाम तय हो गया था. जिस पर रविवार को विधायक दल की औपचारिक मुहर लगाई गई.
इससे पहले छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे टीएस सिंहदेव को इस पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा था. इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत और सांसद ताम्रध्वज साहू के नाम पर भी चर्चा हुई थी.
तेज़तर्रार नेता की पहचान
अविभाजित मध्य प्रदेश के दुर्ग में 23 अगस्त 1961 को जन्मे भूपेश बघेल का संबंध किसान परिवार से है.
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने वाले भूपेश बघेल ने एक आक्रमक राजनीति करने वाले कांग्रेस के नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई है.
चार साल तक युवक कांग्रेस के ज़िला अध्यक्ष रहने वाले भूपेश बघेल को बाद में मध्य प्रदेश युवक कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया.
पहला चुनाव
1993 में जब विधानसभा चुनाव हुये तब भूपेश बघेल ने पहली बार दुर्ग की पाटन विधानसभा से चुनाव लड़ा और बसपा के केजूराम वर्मा को हरा कर विधानसभा में पहुंचे. 1998 में भाजपा की निरुपमा चंद्राकर को हराने के बाद उन्हें मध्यप्रदेश की दिग्विजय सिंह सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया.
छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनने के बाद 2003 में हुये चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और उन्हें विधानसभा में विपक्षी दल का उपनेता बनाया गया. हालांकि 2004 में दुर्ग से और 2009 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन उन्हें दोनों ही चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. 2008 में वे विधानसभा चुनाव भी हार गये.
राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री के तौर पर वो सोमवार (17 दिसंबर) को रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में शपथ लेंगे. शपथग्रहण की तैयारी पूरी कर ली गई है.
इससे पहले मुख्यमंत्री पद के दूसरे दावेदार टीएस सिंहदेव ने बघेल और खुद को 'जय-वीरू की जोड़ी' बताते हुये शोले का गीत 'तेरे जैसा यार कहां' और 'ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे' को दोहराते हुये दावा किया कि वो कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे.
विधानसभा में प्रतिपक्ष के उपनेता रहे आदिवासी विधायक कवासी लखमा ने कहा, "छत्तीसगढ़ के एक किसान के बेटे को मुख्यमंत्री बनाकर हमारी पार्टी ने संदेश दिया है कि राज्य के गरीब, आदिवासी और किसान सुरक्षित हैं. हमारे बस्तर के विकास का रास्ता साफ़ हो गया है."
कैसे तय हुआ नाम
दिल्ली में पिछले तीन दिन से कई दौर की बैठक के बाद रविवार की सुबह ही भूपेश बघेल के अलावा पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे और छत्तीसगढ़ के प्रभारी पीएल पुनिया समेत दूसरे नेता रायपुर पहुंचे थे.
इस घोषणा के साथ ही पिछले कई दिनों से पार्टी के भीतर चला आ रहा गतिरोध खत्म हो गया है.
माना जा रहा है कि रायपुर से लेकर दिल्ली तक पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ कई-कई दौर की बैठकों के बाद शनिवार को ही भूपेश बघेल का नाम तय हो गया था. जिस पर रविवार को विधायक दल की औपचारिक मुहर लगाई गई.
इससे पहले छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे टीएस सिंहदेव को इस पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा था. इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत और सांसद ताम्रध्वज साहू के नाम पर भी चर्चा हुई थी.
तेज़तर्रार नेता की पहचान
अविभाजित मध्य प्रदेश के दुर्ग में 23 अगस्त 1961 को जन्मे भूपेश बघेल का संबंध किसान परिवार से है.
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने वाले भूपेश बघेल ने एक आक्रमक राजनीति करने वाले कांग्रेस के नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई है.
चार साल तक युवक कांग्रेस के ज़िला अध्यक्ष रहने वाले भूपेश बघेल को बाद में मध्य प्रदेश युवक कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया.
पहला चुनाव
1993 में जब विधानसभा चुनाव हुये तब भूपेश बघेल ने पहली बार दुर्ग की पाटन विधानसभा से चुनाव लड़ा और बसपा के केजूराम वर्मा को हरा कर विधानसभा में पहुंचे. 1998 में भाजपा की निरुपमा चंद्राकर को हराने के बाद उन्हें मध्यप्रदेश की दिग्विजय सिंह सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया.
छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनने के बाद 2003 में हुये चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और उन्हें विधानसभा में विपक्षी दल का उपनेता बनाया गया. हालांकि 2004 में दुर्ग से और 2009 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन उन्हें दोनों ही चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. 2008 में वे विधानसभा चुनाव भी हार गये.
Thursday, December 13, 2018
राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को मिली जीत, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए प्रस्तावित महागठबंधन में राहुल गांधी को अगली क़तार में लाकर खड़ा कर दिया है.
तेलंगाना में मिली नाकामी ने भले ही आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की धार कम कर दी हो लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए के ख़िलाफ़ राज्यवार गठजोड़ बनाने की शुरुआत कर दी है.
कांग्रेस पार्टी की कमान औपचारिक तौर पर संभाले हुए राहुल गांधी के एक साल पूरे हो गए हैं.
और तब से अब तक कांग्रेस के अंदर और बाहर दोनों ही मोर्चों पर राहुल गांधी का क़द यक़ीनन बढ़ा है.
साल 2014 के बाद पहली बार मोदी-शाह की बीजेपी राहुल की कांग्रेस के हाथों सीधे मुक़ाबले में हारी है.
राहुल गांधी पर अब इस बात का दबाव बढ़ेगा कि वे ख़ुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश करें या क्षेत्रीय पार्टियों का गठजोड़ खड़ा करने की पहल करें.
और तस्वीर का दूसरा पहलू ये भी है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के अपने ख़ेमे में इतनी जगह ही नहीं है कि उसमें मायावती की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को समाहित किया जा सके.
सत्तर सांसदों और 320 विधायकों के साथ किसी भी गठबंधन में मायावती के लिए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वाजिब सीटें छोड़ना एक ख़ौफ़नाक़ अनुभव हो सकता.
इसके नतीजे भी उल्टे साबित हो सकते हैं.
जम्मू और कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और गुजरात, पूरी हिंदी पट्टी से लोकसभा के लिए 273 सांसद चुने जाते हैं.
मौजूदा लोकसभा में इनमें से क़रीब 200 सीटें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं.
मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों और उत्तर प्रदेश में बसपा और समाजवादी पार्टी के संभावित गठजोड़ के मद्देनज़र इस बात की पूरी संभावना है कि भाजपा साल 2019 के आम चुनावों में 80 से 100 सीटें तक गंवाने जा रही है.
तेलंगाना में गठबंधन की आस और पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल या फिर तमिलनाडु में सीटें बढ़ने की उम्मीद से इन सीटों की चौथाई से ज़्यादा की भरपाई के आसार नहीं दिखते.
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की कामयाबी सबसे ज़्यादा स्पष्ट है. ये वो सूबा है जहां कांग्रेस के पास कोई भी ताक़तवर क्षत्रप नहीं था.
तेलंगाना में मिली नाकामी ने भले ही आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की धार कम कर दी हो लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए के ख़िलाफ़ राज्यवार गठजोड़ बनाने की शुरुआत कर दी है.
कांग्रेस पार्टी की कमान औपचारिक तौर पर संभाले हुए राहुल गांधी के एक साल पूरे हो गए हैं.
और तब से अब तक कांग्रेस के अंदर और बाहर दोनों ही मोर्चों पर राहुल गांधी का क़द यक़ीनन बढ़ा है.
साल 2014 के बाद पहली बार मोदी-शाह की बीजेपी राहुल की कांग्रेस के हाथों सीधे मुक़ाबले में हारी है.
राहुल गांधी पर अब इस बात का दबाव बढ़ेगा कि वे ख़ुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश करें या क्षेत्रीय पार्टियों का गठजोड़ खड़ा करने की पहल करें.
और तस्वीर का दूसरा पहलू ये भी है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के अपने ख़ेमे में इतनी जगह ही नहीं है कि उसमें मायावती की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को समाहित किया जा सके.
सत्तर सांसदों और 320 विधायकों के साथ किसी भी गठबंधन में मायावती के लिए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वाजिब सीटें छोड़ना एक ख़ौफ़नाक़ अनुभव हो सकता.
इसके नतीजे भी उल्टे साबित हो सकते हैं.
जम्मू और कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और गुजरात, पूरी हिंदी पट्टी से लोकसभा के लिए 273 सांसद चुने जाते हैं.
मौजूदा लोकसभा में इनमें से क़रीब 200 सीटें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं.
मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों और उत्तर प्रदेश में बसपा और समाजवादी पार्टी के संभावित गठजोड़ के मद्देनज़र इस बात की पूरी संभावना है कि भाजपा साल 2019 के आम चुनावों में 80 से 100 सीटें तक गंवाने जा रही है.
तेलंगाना में गठबंधन की आस और पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल या फिर तमिलनाडु में सीटें बढ़ने की उम्मीद से इन सीटों की चौथाई से ज़्यादा की भरपाई के आसार नहीं दिखते.
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की कामयाबी सबसे ज़्यादा स्पष्ट है. ये वो सूबा है जहां कांग्रेस के पास कोई भी ताक़तवर क्षत्रप नहीं था.
Monday, December 10, 2018
पत्नी ने दोस्तों के साथ संबंध बनाने से मना किया तो बाइक से कुचल दिया
दोस्तों के साथ संबंध बनाने से इनकार करने पर एक पति ने पत्नी की जान लेने की कोशिश की. पति ने दोस्तों के साथ मिलकर पत्नी को बुरी तरह से पीटा और उस पर बाइक चढ़ाकर उसे मारने की कोशिश की. ये घटना बिहार के मधेपुरा की है. महिला के पति और उसके दोस्तों ने उसे मृत समझकर सड़क किनारे छोड़ दिया और फरार हो गए.
रिपोर्ट के मुताबिक सड़क किनारे बेहोशी की हालत में पड़ी जख्मी महिला को किसी राहगीर ने सहरसा सदर अस्पताल में भर्ती कराया. यहां पर महिला का इलाज चल रहा है.
पुलिस ने महिला का बयान दर्ज कर लिया है. पुलिस के मुताबिक झारखंड के धनबाद की रहनेवाली पीड़िता ने कहा कि एक साल पहले वह मधेपुरा के एक निजी नर्सिंग होम में नर्स का काम करने आई. लड़की ने कहा कि इस दौरान प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाले एक युवक से उसकी दोस्ती हो गई. युवक का नाम बाल्मीकि साह है. पुलिस के मुताबिक दोनों ने छह माह पहले शादी कर ली.
दोनों के बीच कुछ दिन तक तो सबकुछ ठीक चलता रहा लेकिन धीरे-धीरे उसके पति का रवैया बदल गया. लड़की का आरोप है कि उसका पति घटिया हरकत पर आ गया और उस पर अपने दोस्तों के साथ नाजायज संबंध बनाने का दबाव डालने लगा.
लड़की का कहना है कि वह लगातार इसका विरोध करती रही. एक दिन पति और उसके दोस्तों ने उसे बुरी तरह पीटा और मृत समझकर सड़क के किनारे फेंक फरार हो गए. इस पूरे मामले पर सदर डीएसपी प्रभाकर तिवारी ने कहा कि ये घटना मधेपुरा सदर थाना की है. उन्होंने कहा कि इस केस को जल्द ही स्थानीय पुलिस को जांच के लिए स्थानांतरित किया जाएगा.
हिंसा के बाद गिरफ्तार लोगों से पूछताछ और हिंसा के वीडियो खंगालने के बाद पुलिस को शक हुआ कि गोली शायद जीतू फौजी ने ही चलाई थी.
गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के एक निजी होटल में ईवीएम मशीन और सागर जिले में बिना नंबर की स्कूल बस से स्ट्रॉन्ग रूम में ईवीएम पहुंचाए जाने का वीडियो जारी करते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बीजेपी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जनादेश को पटलने की कोशिश कर रही है. वहीं, एक अन्य मामले में शुक्रवार को ही मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में लगभग एक घंटे के लिए बिजली नहीं होने की वजह से स्ट्रॉन्ग रूम का सीसीटीवी और एलईडी डिस्प्ले इस अवधि में काम नहीं कर पाया.
इन शिकायतों पर चुनाव आयोग ने भी माना है कि मध्य प्रदेश में ऐसी दो घटनाएं हुईं थीं जिसमें ईवीएम को लेकर नियमावली का पालन नहीं किया गया. लेकिन आयोग का कहना था कि यह गलती प्रक्रिया तक ही सीमित है और मशीनों से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई. लेकिन आयोग ने एक अधिकारी को मशीने देरी से जमा कराने के आरोप में सस्पेंड कर दिया.
रिपोर्ट के मुताबिक सड़क किनारे बेहोशी की हालत में पड़ी जख्मी महिला को किसी राहगीर ने सहरसा सदर अस्पताल में भर्ती कराया. यहां पर महिला का इलाज चल रहा है.
पुलिस ने महिला का बयान दर्ज कर लिया है. पुलिस के मुताबिक झारखंड के धनबाद की रहनेवाली पीड़िता ने कहा कि एक साल पहले वह मधेपुरा के एक निजी नर्सिंग होम में नर्स का काम करने आई. लड़की ने कहा कि इस दौरान प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाले एक युवक से उसकी दोस्ती हो गई. युवक का नाम बाल्मीकि साह है. पुलिस के मुताबिक दोनों ने छह माह पहले शादी कर ली.
दोनों के बीच कुछ दिन तक तो सबकुछ ठीक चलता रहा लेकिन धीरे-धीरे उसके पति का रवैया बदल गया. लड़की का आरोप है कि उसका पति घटिया हरकत पर आ गया और उस पर अपने दोस्तों के साथ नाजायज संबंध बनाने का दबाव डालने लगा.
लड़की का कहना है कि वह लगातार इसका विरोध करती रही. एक दिन पति और उसके दोस्तों ने उसे बुरी तरह पीटा और मृत समझकर सड़क के किनारे फेंक फरार हो गए. इस पूरे मामले पर सदर डीएसपी प्रभाकर तिवारी ने कहा कि ये घटना मधेपुरा सदर थाना की है. उन्होंने कहा कि इस केस को जल्द ही स्थानीय पुलिस को जांच के लिए स्थानांतरित किया जाएगा.
हिंसा के बाद गिरफ्तार लोगों से पूछताछ और हिंसा के वीडियो खंगालने के बाद पुलिस को शक हुआ कि गोली शायद जीतू फौजी ने ही चलाई थी.
गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के एक निजी होटल में ईवीएम मशीन और सागर जिले में बिना नंबर की स्कूल बस से स्ट्रॉन्ग रूम में ईवीएम पहुंचाए जाने का वीडियो जारी करते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बीजेपी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जनादेश को पटलने की कोशिश कर रही है. वहीं, एक अन्य मामले में शुक्रवार को ही मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में लगभग एक घंटे के लिए बिजली नहीं होने की वजह से स्ट्रॉन्ग रूम का सीसीटीवी और एलईडी डिस्प्ले इस अवधि में काम नहीं कर पाया.
इन शिकायतों पर चुनाव आयोग ने भी माना है कि मध्य प्रदेश में ऐसी दो घटनाएं हुईं थीं जिसमें ईवीएम को लेकर नियमावली का पालन नहीं किया गया. लेकिन आयोग का कहना था कि यह गलती प्रक्रिया तक ही सीमित है और मशीनों से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई. लेकिन आयोग ने एक अधिकारी को मशीने देरी से जमा कराने के आरोप में सस्पेंड कर दिया.
Tuesday, December 4, 2018
शशि कपूर-जेनिफ़र कैंडल की लव स्टोरी, 28 साल की मोहब्बत में अकेलेपन के 31 साल
त्रिशूल फ़िल्म का एक गाना है, 'मोहब्बत बड़े काम की चीज़ है, काम की चीज़ है', जिसमें शशि कपूर अपने शोख और चुलबुले अंदाज़ में माशूका हेमामालिनी के साथ बार बार ये दोहरा रहे हैं कि 'मोहब्बत बड़े काम की चीज़ है.'
ये शशि कपूर के लिए केवल एक फ़िल्म के गाने के बोल भर नहीं थे क्योंकि उनका पूरा जीवन ही प्रेम से सजा संवरा था. शशि कपूर और जेनिफ़र कैंडल की प्रेम कहानी भले आज से यही कोई 52 साल पहले शुरू हुई थी लेकिन इसे आज भी बॉलीवुड की सबसे बेमिसाल लव स्टोरी मानने में शायद ही किसी को कोई मुश्किल होगी.
ये लव स्टोरी शुरू हुई थी, 1956 में और उसके बाद शशि कपूर अपने पूरे जीवन भर इस मोहब्बत से बाहर नहीं निकल पाए थे. वैसे इसकी शुरुआत बेहद दिलचस्प अंदाज़ में हुई थी.
जेनिफ़र की छोटी बहन और ब्रिटिश रंगमंच की जानी मानी अदाकारा फैलिसिटी कैंडल ने अपनी पुस्तक 'व्हाइट कार्गो' में लिखा है, "जेनिफ़र अपने दोस्त वैंडी के साथ नाटक 'दीवार' देखने रॉयल ओपेरा हाउस गई थी. शशि तब 18 साल के थे.नाटक शुरू होने से पहले उन्होंने दर्शकों का अंदाज़ा लगाने के लिए पर्दे से झांका और उनकी नजर चौथी कतार में बैठी एक लड़की पर गई. काली लिबास और सफेद पोल्का डॉट्स पहने वो लड़की ख़ूबसूरत थी और अपनी सहेली के साथ हंस रह थी. शशि के मुताबिक वे उसे देखते ही दिलो-जान से उस पर फिदा हो गए थे."
लेकिन तब पृथ्वी थिएटर में काम करने वाले शशि कपूर की कोई बड़ी पहचान नहीं थी, उनकी उम्र महज 18 साल थी. दूसरी तरफ जेनिफ़र अपने पिता जेफ़्री कैंडल के थिएटर समूह की लीड अभिनेत्री थीं. थिएटर के चलते दोनों के पिता भी आपस में एक दूसरे को पहचानते थे. लेकिन इन सबके बाद भी शशि कपूर को जेनिफ़र से दोस्ती के लिए इंतज़ार करना पड़ा.
शशि कपूर ने अपनी पुस्तक पृथ्वीवालाज में लिखा है, "मैंने जेनिफर के कई नाटक भी देखे, लेकिन उन्होंने कोई नोटिस नहीं लिया. कुछ दिनों के बाद एक दिन रॉयल ओपेरा हाउस में उन्होंने कहा कि मैं बंबई में रहती हूं और हम लोग मिल सकते हैं."
शशि कपूर को गे समझ बैठी थीं जेनिफ़र
इसके बाद शशि कपूर रोजाना ही जेनिफ़र से मिलने लगे. जेनिफ़र तब शशि कूपर से पांच साल बड़ी थीं. इसके लिए वे मुंबई की लोकल से एक स्टेशन ज़्यादा दूर तक जाते थे ताकि जेनिफ़र के साथ फिर वे थिएटर के अभ्यास के लिए रॉयल ऑपेरा हाउस तक साथ साथ जाते थे.
उन्होंने अपने इन मुलाकातों के बारे में लिखा है, "रॉयल ओपेरा हाउस के पास एक ढाबा हुआ करता था, मथुरा डेयरी फर्म. हम लोग तब पूरी भाजी की प्लेट खाते थे. तब एक प्लेट चार आने का मिलता था. साथ ही खाते थे."
वैसे दिलचस्प ये ही तब शशि कपूर बेहद शर्मीले हुआ करते थे, इतने शर्मीले कि जेनिफ़र उन्हें गे समझने लगी थीं. इस बारे में शशि कपूर ने पृथ्वीवालाज़ में लिखा है, "जेनिफ़र ने मुझे बाद में बताया कि वो मुझे गे समझने लगी थी."
हालांकि इसकी वजह भी बेहद दिलचस्प थी. शशि कपूर भारतीय मानसिकताओं के मुताबिक जब जेनिफ़र के साथ होते थे, तब उनका हाथ पकड़ बैठे रहते थे. जेनिफ़र जिस संस्कृति से आई थीं, वहां हाथ में हाथ लेकर बैठने को असहज माना जाता था.
ये शशि कपूर के लिए केवल एक फ़िल्म के गाने के बोल भर नहीं थे क्योंकि उनका पूरा जीवन ही प्रेम से सजा संवरा था. शशि कपूर और जेनिफ़र कैंडल की प्रेम कहानी भले आज से यही कोई 52 साल पहले शुरू हुई थी लेकिन इसे आज भी बॉलीवुड की सबसे बेमिसाल लव स्टोरी मानने में शायद ही किसी को कोई मुश्किल होगी.
ये लव स्टोरी शुरू हुई थी, 1956 में और उसके बाद शशि कपूर अपने पूरे जीवन भर इस मोहब्बत से बाहर नहीं निकल पाए थे. वैसे इसकी शुरुआत बेहद दिलचस्प अंदाज़ में हुई थी.
जेनिफ़र की छोटी बहन और ब्रिटिश रंगमंच की जानी मानी अदाकारा फैलिसिटी कैंडल ने अपनी पुस्तक 'व्हाइट कार्गो' में लिखा है, "जेनिफ़र अपने दोस्त वैंडी के साथ नाटक 'दीवार' देखने रॉयल ओपेरा हाउस गई थी. शशि तब 18 साल के थे.नाटक शुरू होने से पहले उन्होंने दर्शकों का अंदाज़ा लगाने के लिए पर्दे से झांका और उनकी नजर चौथी कतार में बैठी एक लड़की पर गई. काली लिबास और सफेद पोल्का डॉट्स पहने वो लड़की ख़ूबसूरत थी और अपनी सहेली के साथ हंस रह थी. शशि के मुताबिक वे उसे देखते ही दिलो-जान से उस पर फिदा हो गए थे."
लेकिन तब पृथ्वी थिएटर में काम करने वाले शशि कपूर की कोई बड़ी पहचान नहीं थी, उनकी उम्र महज 18 साल थी. दूसरी तरफ जेनिफ़र अपने पिता जेफ़्री कैंडल के थिएटर समूह की लीड अभिनेत्री थीं. थिएटर के चलते दोनों के पिता भी आपस में एक दूसरे को पहचानते थे. लेकिन इन सबके बाद भी शशि कपूर को जेनिफ़र से दोस्ती के लिए इंतज़ार करना पड़ा.
शशि कपूर ने अपनी पुस्तक पृथ्वीवालाज में लिखा है, "मैंने जेनिफर के कई नाटक भी देखे, लेकिन उन्होंने कोई नोटिस नहीं लिया. कुछ दिनों के बाद एक दिन रॉयल ओपेरा हाउस में उन्होंने कहा कि मैं बंबई में रहती हूं और हम लोग मिल सकते हैं."
शशि कपूर को गे समझ बैठी थीं जेनिफ़र
इसके बाद शशि कपूर रोजाना ही जेनिफ़र से मिलने लगे. जेनिफ़र तब शशि कूपर से पांच साल बड़ी थीं. इसके लिए वे मुंबई की लोकल से एक स्टेशन ज़्यादा दूर तक जाते थे ताकि जेनिफ़र के साथ फिर वे थिएटर के अभ्यास के लिए रॉयल ऑपेरा हाउस तक साथ साथ जाते थे.
उन्होंने अपने इन मुलाकातों के बारे में लिखा है, "रॉयल ओपेरा हाउस के पास एक ढाबा हुआ करता था, मथुरा डेयरी फर्म. हम लोग तब पूरी भाजी की प्लेट खाते थे. तब एक प्लेट चार आने का मिलता था. साथ ही खाते थे."
वैसे दिलचस्प ये ही तब शशि कपूर बेहद शर्मीले हुआ करते थे, इतने शर्मीले कि जेनिफ़र उन्हें गे समझने लगी थीं. इस बारे में शशि कपूर ने पृथ्वीवालाज़ में लिखा है, "जेनिफ़र ने मुझे बाद में बताया कि वो मुझे गे समझने लगी थी."
हालांकि इसकी वजह भी बेहद दिलचस्प थी. शशि कपूर भारतीय मानसिकताओं के मुताबिक जब जेनिफ़र के साथ होते थे, तब उनका हाथ पकड़ बैठे रहते थे. जेनिफ़र जिस संस्कृति से आई थीं, वहां हाथ में हाथ लेकर बैठने को असहज माना जाता था.
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ويشرح فواز هذه النقطة بالقول
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